तेहरान/वॉशिंगटन। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष को 100 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन अब तक न तो किसी पक्ष को निर्णायक बढ़त मिली है और न ही शांति की कोई स्पष्ट राह दिखाई दे रही है। युद्ध ने मध्य पूर्व में व्यापक अस्थिरता पैदा कर दी है, जबकि तेल बाजार, वैश्विक व्यापार और कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है और बढ़ती तेल कीमतों के साथ खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।
100 दिनों बाद भी नहीं थमा युद्ध
7 जून को युद्ध के 100 दिन पूरे होने के बावजूद हालात सामान्य होने के कोई संकेत नहीं हैं। शुरुआती हमलों के बाद शुरू हुआ यह संघर्ष अब कई मोर्चों पर फैल चुका है। ईरान, इजरायल, अमेरिका और लेबनान में सक्रिय हिजबुल्लाह के बीच लगातार तनाव बना हुआ है।
हजारों लोगों की जान गई
युद्ध में अब तक हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। लेबनान और ईरान में सबसे अधिक जनहानि हुई है, जबकि लाखों लोग विस्थापित होने को मजबूर हुए हैं। लगातार हो रहे हमलों के कारण नागरिक क्षेत्रों में भी भारी नुकसान पहुंचा है और मानवीय संकट गहराता जा रहा है।
अमेरिका पर बढ़ता आर्थिक बोझ
विश्लेषकों के अनुसार युद्ध के शुरुआती दिनों में ही अमेरिका को अरबों डॉलर का खर्च उठाना पड़ा। रक्षा अभियानों, सैन्य तैनाती और ईंधन लागत में लगातार बढ़ोतरी के कारण यह संघर्ष अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहा है। कुछ राजनीतिक नेताओं ने अनुमान लगाया है कि लंबी अवधि में इसकी लागत खरबों डॉलर तक पहुंच सकती है।
शांति वार्ता ठप
युद्ध विराम और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की कोशिशें फिलहाल ठप पड़ी हुई हैं। दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। ईरान ने संकेत दिया है कि किसी भी समझौते से पहले उसे कई महत्वपूर्ण शर्तों पर आश्वासन चाहिए।
कौन है बढ़त में?
युद्ध के 100 दिन बाद भी कोई स्पष्ट विजेता सामने नहीं आया है। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है, वहीं ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों ने भी जवाबी कार्रवाई जारी रखी है। दोनों पक्ष सीमित सफलताओं का दावा कर रहे हैं, लेकिन निर्णायक परिणाम अभी दूर है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा केंद्र
इस पूरे संघर्ष का सबसे संवेदनशील पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। क्षेत्र में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और जहाजरानी पर पड़े असर के कारण वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।
भारत पर क्यों बढ़ी चिंता?
भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है और इसका अधिकांश भाग होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। ऐसे में युद्ध के कारण तेल कीमतों में वृद्धि भारत के लिए आर्थिक चुनौती बन सकती है। इसके अलावा खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ी है।
लेबनान में भी जारी संघर्ष
हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच जारी टकराव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। संघर्ष विराम की कोशिशों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच हमले जारी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनान में शांति के बिना व्यापक क्षेत्रीय समझौता मुश्किल होगा।
खाड़ी देशों पर भी असर
हालांकि कई खाड़ी देश सीधे तौर पर युद्ध में शामिल नहीं हैं, लेकिन मिसाइल और ड्रोन हमलों, व्यापारिक व्यवधानों और बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों का असर उन पर भी पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में हवाई सेवाएं प्रभावित हुई हैं और ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचा है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल युद्ध के जल्द समाप्त होने के संकेत नहीं हैं। दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे हैं और क्षेत्रीय तनाव लगातार बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह संघर्ष कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ता है या और अधिक व्यापक रूप लेता है, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
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