Thursday, 27 August 2026
Swaraj Express
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मध्य प्रदेश

22 अगस्त 1930: बैतूल का वह वनवासी आंदोलन, जब जंगल के अधिकार के लिए चलीं अंग्रेजों की गोलियां

 

ब्रिटिश शासन के दौर में भारत के जंगलों पर अंग्रेज सरकार ने कानूनों के जरिए अपना अधिकार कायम कर लिया था। इसका सबसे गहरा असर उन वनवासी समुदायों पर पड़ा, जिनका जीवन सदियों से जंगल और उसकी उपज पर निर्भर था। वन उपज पर रोक, जबरन मजदूरी और अंग्रेजी वन व्यवस्था के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में असंतोष बढ़ रहा था। मध्य प्रदेश के बैतूल में भी इसी असंतोष ने 22 अगस्त 1930 को एक बड़े वनवासी आंदोलन का रूप लिया, जिसे पुलिस गोलीकांड ने रक्तरंजित कर दिया।

इस आंदोलन का नेतृत्व बैतूल क्षेत्र के वनवासी युवा गंजन सिंह कोरकू ने किया। उन्होंने जंगलों पर अंग्रेजी नियंत्रण और वनवासियों के साथ हो रहे कथित अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई। बताया जाता है कि गंजन सिंह ने आसपास के वन क्षेत्रों में घूम-घूमकर लोगों को संगठित किया और उन्हें अपने जंगलों की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। धीरे-धीरे बड़ी संख्या में वनवासी उनके साथ आने लगे।

आंदोलनकारियों के पास आधुनिक हथियार नहीं थे। उनके हाथों में कुल्हाड़ी, हंसिया और तीर-कमान जैसे पारंपरिक हथियार थे। करीब 500 वनवासियों की एक टोली तैयार हुई। आंदोलनकारियों ने जंगलों में तैनात अंग्रेजी शासन के नाकेदारों, चौकीदारों और जमादारों को वहां से खदेड़ दिया और वन क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

अंग्रेजी प्रशासन के लिए यह सीधी चुनौती थी। वनवासियों के इस प्रतिरोध की खबर मिलने के बाद बड़ी संख्या में पुलिस बल इलाके में पहुंचा। 22 अगस्त 1930 को आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच आमना-सामना हुआ। पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया, लेकिन वनवासी पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। स्थिति बिगड़ने के बाद पुलिस ने गोली चला दी।

इस गोलीकांड में कम से कम एक वनवासी की मौत का उल्लेख ब्रिटिश काल के दस्तावेजों में मिलता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि उस बलिदानी का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज क्यों नहीं हुआ? स्थानीय जनचर्चाओं में इस घटना में कई वनवासियों के बलिदान की बात कही जाती है। यह भी कहा जाता है कि कई लोग गोली लगने से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि उपलब्ध विवरणों में इन सभी बलिदानियों के नाम स्पष्ट रूप से सामने नहीं आते।

कहा जाता है कि पुलिस की कार्रवाई के बाद स्थिति इतनी भयावह थी कि घटनास्थल पर मृत और घायल पड़े वनवासियों को उठाने वाला तक कोई नहीं बचा था। ब्रिटिश प्रशासन की प्राथमिकता आंदोलन को दबाना और उसके नेतृत्व को पकड़ना थी।

पुलिस की कार्रवाई का मुख्य निशाना गंजन सिंह कोरकू भी थे। हालांकि वे पुलिस की गिरफ्त से बच निकलने में सफल रहे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फरार घोषित कर दिया और उनकी गिरफ्तारी पर 500 रुपये का इनाम घोषित किया। करीब एक महीने बाद एक विश्वासघात के कारण गंजन सिंह को पचमढ़ी में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्हें पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और रायपुर जेल में रखा गया।

बैतूल का यह आंदोलन केवल एक स्थानीय संघर्ष नहीं था। यह उस दौर की उस बड़ी लड़ाई का हिस्सा था जिसमें वनवासी समुदाय अपने पारंपरिक जंगल, वन उपज और जीवन के अधिकार को बचाने के लिए औपनिवेशिक सत्ता के सामने खड़े हो रहे थे। अंग्रेजों की वन नीति ने जंगलों को सरकारी संपत्ति में बदल दिया था, जबकि सदियों से इन जंगलों पर निर्भर समुदायों के अधिकार सीमित कर दिए गए थे।

22 अगस्त 1930 की घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि संघर्ष में जान गंवाने वाले कई लोगों की पहचान इतिहास में सुरक्षित नहीं रह सकी। एक ओर सरकारी दस्तावेज गोलीकांड और एक वनवासी की मृत्यु का उल्लेख करते हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्मृतियां इस घटना में हुए व्यापक नुकसान की ओर इशारा करती हैं।

आज जब स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बड़े नेताओं और बड़े आंदोलनों की चर्चा होती है, तब बैतूल के जंगलों में अपने अधिकारों के लिए खड़े हुए इन वनवासियों की कहानी कहीं पीछे छूट जाती है। 22 अगस्त 1930 का दिन याद दिलाता है कि आजादी की लड़ाई केवल शहरों, सभागारों और बड़े राजनीतिक आंदोलनों तक सीमित नहीं थी। देश के जंगलों में रहने वाले वनवासी भी अपने जल, जंगल और जमीन के अधिकार के लिए औपनिवेशिक सत्ता से टकरा रहे थे—और कई ने इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई।

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