Thursday, 27 August 2026
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25 अगस्त 2003: मुंबई के दोहरे आतंकी विस्फोट, 54 लोगों की मौत से दहल उठी थी मायानगरी

अगस्त का महीना भारत के इतिहास में स्वतंत्रता और संघर्ष की अनेक स्मृतियां समेटे हुए है। लेकिन आजादी के बाद भी देश को समय-समय पर ऐसे आतंकी हमलों का दर्द झेलना पड़ा, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। 25 अगस्त 2003 भी ऐसा ही एक दिन था, जब मुंबई में कुछ ही अंतराल के भीतर दो कार बम धमाकों ने तबाही मचा दी। जावेरी बाजार और गेटवे ऑफ इंडिया पर हुए इन विस्फोटों में 54 लोगों की मौत हुई, जबकि 244 लोग घायल हुए। बाद में कुछ घायलों की भी मौत हो गई।

25 अगस्त 2003 को मुंबई के व्यस्त जावेरी बाजार में पहला धमाका हुआ। यह धमाका एक टैक्सी में रखे बम के जरिए किया गया था। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि आसपास का इलाका बुरी तरह दहल गया। करीब 200 मीटर तक जमीन हिलने की बात सामने आई और आसपास की कई इमारतों में दरारें पड़ गईं। दुकानों के शीशे टूट गए और एक ज्वैलरी स्टोर समेत कई कारोबारी प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा। इस धमाके में 29 लोगों की जान चली गई।

पुलिस और प्रशासन की टीमें जावेरी बाजार में राहत और बचाव कार्य में जुटी ही थीं कि मुंबई के दूसरे हिस्से से एक और धमाके की खबर आई। इस बार निशाना बना गेटवे ऑफ इंडिया। यहां भी एक टैक्सी में बम रखा गया था। इस विस्फोट में 25 लोगों की मौत हुई और 200 से अधिक लोग घायल हुए। कुछ ही समय में मुंबई के दो प्रमुख स्थानों पर हुए इन धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया।

जांच में सामने आया कि दोनों धमाकों के लिए टैक्सियों का इस्तेमाल किया गया था। आरोपियों ने टैक्सियां किराये पर लीं और उनमें टाइमर से जुड़े विस्फोटक रखकर उन्हें भीड़भाड़ वाले इलाकों में खड़ा कर दिया। इसके बाद वे टैक्सी ड्राइवरों से यह कहकर चले गए कि वे जल्द वापस लौटेंगे।

जावेरी बाजार में टैक्सी चालक अपनी गाड़ी में बैठकर सवारियों के लौटने का इंतजार कर रहा था। इसी दौरान विस्फोट हो गया और उसकी भी मौत हो गई। वहीं गेटवे ऑफ इंडिया पर टैक्सी चालक वाहन से बाहर निकलकर टहलने लगा था। इसी वजह से उसकी जान बच गई। जांच एजेंसियों के लिए यही चालक अहम कड़ी साबित हुआ।

टैक्सी चालक के बयान और जांच से पुलिस को आरोपियों तक पहुंचने में मदद मिली। मामले में हनीफ, फहमीदा और अशरफ को गिरफ्तार किया गया। जांच के दौरान इन पर दोनों धमाकों में शामिल होने के आरोप लगे। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों ने पहले जावेरी बाजार में विस्फोटक से भरा बैग टैक्सी में छोड़ा और फिर दूसरी टैक्सी लेकर गेटवे ऑफ इंडिया पहुंचे, जहां दूसरा बैग छोड़कर चले गए।

जांच में आरोपियों के संबंध पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से होने का भी आरोप सामने आया। इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा और आरोपियों के खिलाफ लंबी कानूनी प्रक्रिया चली।

करीब छह साल बाद, अगस्त 2009 में अदालत ने तीनों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई। हालांकि, इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील की। मामला वर्षों तक अदालतों में चलता रहा और अंतिम कानूनी प्रक्रिया लंबी होती चली गई।

25 अगस्त 2003 के मुंबई धमाकों ने यह दिखा दिया था कि आतंकवाद का निशाना केवल कोई एक स्थान नहीं, बल्कि आम नागरिकों की जिंदगी और देश की सुरक्षा व्यवस्था होती है। जावेरी बाजार की भीड़ से लेकर गेटवे ऑफ इंडिया के पर्यटकों तक, उस दिन मुंबई के दो अलग-अलग हिस्सों में निर्दोष लोगों ने आतंक की कीमत चुकाई। 23 साल बाद भी 25 अगस्त 2003 का वह दिन मुंबई के इतिहास में एक दर्दनाक अध्याय के रूप में याद किया जाता है।

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