Thursday, 27 August 2026
Swaraj Express
person
जरा हटके

30 जुलाई 1923: आध्यात्म, इतिहास और संस्कृत के अप्रतिम शोधकर्ता आचार्य गोविन्द चंद्र पाण्डेय का जन्म

भारत में एक ओर भारतीय परंपराओं, संस्कृति और वैदिक ज्ञान पर प्रश्नचिह्न खड़े करने तथा कूटरचित प्रसंगों के माध्यम से उन्हें कलुषित करने का प्रयास होता रहा, तो दूसरी ओर कुछ ऐसी विभूतियाँ भी हुईं जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अध्ययन, शोध और अनुसंधान के माध्यम से सत्य को स्थापित करने में समर्पित कर दिया। आचार्य गोविन्द चंद्र पाण्डेय ऐसी ही विलक्षण विभूति थे, जिन्होंने आध्यात्म, इतिहास, दर्शन, भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अपने गहन अध्ययन और लेखन से भारतीय ज्ञान परंपरा को नई दृष्टि प्रदान की।

आचार्य गोविन्द चंद्र पाण्डेय का जन्म 30 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज क्षेत्र अंतर्गत काशीपुर में हुआ। उनके पूर्वज मूलतः उत्तराखंड के अल्मोड़ा निवासी थे, जो समय के साथ प्रयागराज आकर बस गए। उनके पिता पीताम्बर दत्त पाण्डे भारत सरकार की लेखा सेवा में अधिकारी होने के साथ-साथ संस्कृत के विद्वान भी थे। माता प्रभावती देवी भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों का पालन करने वाली धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। परिवार में आधुनिक शिक्षा और भारतीय परंपरा—दोनों का संतुलित वातावरण था। पिता ने बालक का नाम गोविन्द रखा और इसी संस्कारमय परिवेश में उनका बचपन बीता।

गोविन्द चंद्र पाण्डेय बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। उन्होंने काशीपुर के विद्यालय में सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। परिवार ने उनकी शिक्षा का विशेष ध्यान रखा। एक ओर आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था की गई, तो दूसरी ओर आचार्य रघुवीर दत्त शास्त्री और पंडित रामशंकर द्विवेदी जैसे विद्वानों से संस्कृत, व्याकरण, साहित्य और शास्त्रों का अध्ययन भी कराया गया। उच्च शिक्षा के लिए वे प्रयागराज आए, जहाँ स्नातकोत्तर तक की सभी परीक्षाएँ सर्वोच्च अंकों से उत्तीर्ण कीं। साथ ही संस्कृत, धर्म, दर्शन और इतिहास का अध्ययन निरंतर जारी रखा। वर्ष 1947 में उन्होंने डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। अध्ययन काल में ही उन्होंने पालि, प्राकृत, फ्रेंच, जर्मन और चीनी भाषाओं का भी गंभीर अध्ययन किया।

आगे चलकर उन्होंने इन्हीं विषयों को अपने लेखन का केंद्र बनाया। संस्कृति, दर्शन, साहित्य और इतिहास पर उनके अनेक आलोचनात्मक शोधग्रंथ, काव्य-ग्रंथ और शोधपूर्ण आलेख भारत ही नहीं, विदेशों में भी सम्मानपूर्वक प्रकाशित हुए। संस्कृत में उनकी प्रमुख कृतियों में ‘दर्शन विमर्शः’ (1996, वाराणसी), ‘सौन्दर्य दर्शन विमर्शः’ (1996, वाराणसी), ‘एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति’ (1997, वाराणसी) तथा ‘न्यायबिन्दु’ (1975, सारनाथ-जयपुर) प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त संस्कृति एवं इतिहास पर पाँच तथा दर्शन विषय पर आठ महत्वपूर्ण ग्रंथों का उन्होंने लेखन किया, जिनमें ‘शंकराचार्य: विचार और सन्दर्भ’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। साहित्य के क्षेत्र में भी संस्कृत भाषा में उनकी आठ अन्य महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाशित हुईं।

आचार्य गोविन्द चंद्र पाण्डेय के रचना संसार की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने किसी विचारधारा का खंडन या तुलनात्मक आलोचना करने के बजाय केवल अपने शोध और तर्कों के आधार पर भारतीय ज्ञान परंपरा की विशिष्टता को स्थापित किया। उन्होंने ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं का हिंदी काव्यानुवाद भी किया। दर्शन, इतिहास और संस्कृत विषयों पर उनके ग्रंथ आज भी शोधार्थियों के लिए आधारग्रंथ माने जाते हैं। वेद वाङ्मय पर उनकी कृति ‘वैदिक संस्कृति’ भारतीय बौद्धिक परंपरा की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।

उनका अंतिम प्रमुख कार्य ऋग्वेद का हिंदी अनुवाद और भाष्य था। इसके प्रथम खंड का लोकार्पण वर्ष 2008 में नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लोकभारती के दिनेश चंद्र ग्रोवर, सांसद मुरली मनोहर जोशी तथा कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी द्वारा किया गया। भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा में उनके अतुलनीय योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2010 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। अध्ययन, शोध और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण के लिए जीवन समर्पित करने वाली यह महान विभूति 22 मई 2011 को परम् ज्योति में विलीन हो गई।

 
 
Share
0
0
0

Comments

Leave a Reply