Bhopal desk: आज हम आपके साथ साझा कर रहे है...हाल ही मे हुए प्रमोशन के खेला का...जी हां पदोन्नति का प्रहसन : जहां पीएचई विभाग में सारे नियम ताक पर रखकर चहेतों पर कृपा की वर्षाई गयी..शुरुआत इस लाइन से कर रहे है....."जब व्यवस्था के तराजू पर न्याय नहीं, प्रभाव तौला जाने लगे... तब पदोन्नति योग्यता का नहीं, कृपा का पुरस्कार बन जाती है।"..यानि.."अन्धा बाँटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह कर देय"—लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में हाल ही में हुई पदोन्नतियों पर यह कहावत मानो अक्षरशः चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। जिन पदोन्नतियों से वर्षों से ठहरे अधिकारियों-कर्मचारियों को न्याय मिलने की उम्मीद थी, वही प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है।लगभग एक दशक तक प्रदेश के अधिकांश विभागों की तरह पी.एच.ई. में भी पदोन्नतियां न्यायालयीन विवादों के कारण लंबित रहीं। जैसे ही शासन और न्यायालय से पदोन्नति का मार्ग प्रशस्त हुआ, विभाग ने अभूतपूर्व गति से पदोन्नति आदेश जारी कर दिए। किंतु आरोप यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में न तो सेवा अभिलेखों की गंभीर समीक्षा हुई, न लंबित प्रकरणों का परीक्षण और न ही विभागीय आचरण को कसौटी बनाया गया। यहां तक की लोकायुक्त ने जिसे ट्रैप किया उसे भी पदोन्नति दे दी गई....इन्दौर में पदस्थ सहायक यंत्री निधि मिश्रा को लोकायुक्त ने कथित रूप से 60 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। घटना को दो वर्ष बीत जाने के बाद भी विभाग ने अभियोजन स्वीकृति प्रदान नहीं की, जिसके कारण न्यायालय में विधिवत अभियोजन प्रारंभ नहीं हो सका। किंतु लोकायुक्त में प्रकरण आज भी दर्ज है।प्रश्न यह है कि जिस अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार का मामला लंबित हो, उसके सेवा आचरण की समीक्षा किए बिना उसे सहायक यंत्री से कार्यपालन यंत्री के पद पर पदोन्नत करना किस नियम और किस विवेक के अंतर्गत हुआ? ऐसे ही तीन संतान वाले के भी पदोन्नत कर कार्यपालन यंत्री को अधीक्षण यंत्री बना दिया गया...यह मामला भोपाल में पदस्थ कार्यपालन यंत्री आलोक अग्रवाल का है। आरोप है कि उनकी तीन संतानें हैं, जबकि मध्यप्रदेश की सेवा नियमावली के अनुसार निर्धारित तिथि के बाद तीसरी संतान होने पर सरकारी सेवा में बर्खास्तगी की कार्रवाई का प्रावधान है।विडंबना देखिए कि जहां सतना में प्राथमिक शिक्षक नासिर खान को इसी आधार पर वर्ष 2025 में सेवा से पृथक कर दिया गया, वहीं पी.एच.ई. विभाग में आलोक अग्रवाल को किसी कार्रवाई के बजाय कार्यपालन यंत्री से अधीक्षण यंत्री पद पर पदोन्नत कर दिया गया।सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नियम विभाग और व्यक्ति देखकर बदल जाते हैं? यदि नहीं, तो दो अलग-अलग विभागों में समान परिस्थिति में इतना भिन्न व्यवहार क्यों...आखिर मे सबसे रोचक मामला पिता पुत्र के द्वारा खेले गये खेल का है..पिता जब विभाग के सर्वेसर्वा हों...सारे नियम कायदे धराशायी हो जाते है...विभाग का सबसे दिलचस्प और चर्चित उदाहरण प्रमुख अभियंता संजय कुमार अंधवान के पुत्र शशांक कुमार अंधवान की पदोन्नति को लेकर सामने आ रहा है।आरोप है कि सहायक यंत्री से कार्यपालन यंत्री बनने के लिए उपलब्ध विभागीय पदों की संख्या के अनुसार शशांक अंधवान का क्रम पदोन्नति सूची में नहीं बन रहा था। किंतु जब विभाग का शीर्ष प्रशासनिक नियंत्रण पिता के हाथों में हो, तो रास्ते भी निकल आते हैं।सूत्रों के अनुसार पदोन्नति के लिए मध्यप्रदेश जल निगम के 31 पदों को जोड़कर पदों की संख्या बढ़ा दी गई और उसी आधार पर शशांक अंधवान का नाम पदोन्नति सूची में शामिल कर दिया गया।यहीं सबसे बड़ा कानूनी प्रश्न खड़ा होता है। मध्यप्रदेश जल निगम एक पृथक निगमित संस्था यानि कॉर्पोरेशन है, जिसकी सेवा संरचना और पद अलग हैं। यदि उसके पदों को विभागीय पदोन्नति में सम्मिलित किया गया, तो क्या इसके लिए सक्षम स्तर से विधिवत स्वीकृति अथवा मंत्रिमंडल का अनुमोदन प्राप्त किया गया था? यदि नहीं, तो यह पूरी प्रक्रिया किस अधिकार के तहत अपनाई गई...बहरहाल यह तो केवल तीन उदाहरण...स्वराज एक्सप्रेस फिलहाल केवल तीन मामलों का उल्लेख कर रहा है। सूत्रों का दावा है कि यदि हाल ही में हुई समस्त पदोन्नतियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो अनेक और ऐसे प्रकरण सामने आ सकते हैं, जहां पात्रता से अधिक प्रभाव, नियमों से अधिक संबंध और योग्यता से अधिक कृपा का बोलबाला दिखाई देगा।पदोन्नति किसी अधिकारी का अधिकार अवश्य हो सकती है, किंतु वह निष्पक्षता, पारदर्शिता और समान नियमों के पालन पर आधारित होनी चाहिए। यदि भ्रष्टाचार के आरोपित, विवादित सेवा अभिलेख वाले अथवा विशेष संरक्षण प्राप्त अधिकारी ही लाभान्वित होते रहेंगे, तो ईमानदारी से सेवा देने वाले अधिकारियों का मनोबल कैसे बचेगा? चलते चलते यह खबर भी दे दें कि पीएचई विभाग मे सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक महीने भर के अन्दर दूसरी दिवाली माना ली गई...पहली ट्रांस्फर उद्योग में तो दूसरी अब प्रमोशन के खेल में...जो स्वराज एक्सप्रेस ने उदाहरण सहित बताया है.. फिलहाल पी.एच.ई. विभाग की इन पदोन्नतियों ने यही प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या यह वास्तव में योग्यता का सम्मान था... या फिर सत्ता और प्रभाव का पुरस्कार? चलते चलते मै यह कहने मे कोई गुरेज नहीं रखता कि जब "जब नियमों की पुस्तक अलमारी में बंद हो जाए और कृपा ही कानून बन जाए, तब व्यवस्था नहीं, विशेषाधिकार शासन करने लगते हैं।"
PHE में ट्रांसफर उद्योग के बाद, प्रमोशन उद्योग की बनी दिवाली।
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