Thursday, 27 August 2026
Swaraj Express
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मध्य प्रदेश

MD और मंत्री के OSD का गठजोड़ सचिव साहब हुए दरकिनार

लोभमूलानि पापानि, लोभमूलं महद्भयम्। लोभात् क्रोधः प्रभवति, लोभात् सर्वं विनश्यति॥"…अर्थात— लोभ ही समस्त पापों का मूल है, लोभ ही महाविनाश का कारण बनता है। जब शासन और व्यवस्था पर लोभ का आधिपत्य स्थापित हो जाए, तब राजकोष भी लूट का साधन बन जाता है। कुछ ऐसा ही हो रहा है राजधानी स्थित एक बोर्ड के एम.डी. और विभाग के मंत्री के ओएसडी की मिलीभगत से.... कुछ दिवस पूर्व मैंने "टेंडर में मलाई की महाभारत" शीर्षक से एक विशेष समाचार प्रसारित किया था। उस समाचार में इसी बोर्ड मुख्यालय का रहस्योद्घाटन किया गया था, जहाँ विकास की धारा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की भागीरथी अविरल प्रवाहित हो रही है। हमने संकेत दिया था कि करोड़ों रुपये की निविदाओं को सुनियोजित ढंग से साधने और राजकोष को निजी तिजोरियों तक पहुँचाने की रूपरेखा तैयार की जा रही है।..कहा भी गया है—....."समरथ को नहि दोष गुसाईं। रवि पावक सुरसरि की नाईं॥"...किन्तु तुलसीदास की यह चौपाई सामर्थ्य के सदुपयोग की ओर संकेत करती है; यहाँ तो सामर्थ्य का प्रयोग सार्वजनिक धन के दोहन और व्यवस्था के अपवित्रिकरण में होता दिखाई दे रहा है। आज स्वराज एक्सप्रेस उसी बोर्ड की एक और परत उद्घाटित करने जा रहा है—एक ऐसी खरीद प्रक्रिया, जिसमें प्यास बुझाने के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई को निचोड़ा जा रहा है.. विषय है प्रदेश के विभिन्न जिलों और विकासखंडों में स्थित कार्यालयों के लिए खरीदे गए वाटर कूलर और वाटर प्यूरीफायर। कहने को यह खरीद जनसुविधा के लिए थी, किन्तु दस्तावेज़ों की परतें बताती हैं कि सुविधा की आड़ में राजकोष पर असाधारण प्रहार किया गया। जिन वाटर कूलरों का बाज़ार मूल्य सामान्यतः एक होता है, उन्हें लगभग तीन गुना मूल्य पर खरीदा गया। संख्या भी कोई दस-पाँच नहीं, बल्कि सैकड़े के पार पहुँचती है। चालाकी ऐसी कि मुख्यालय में बैठे एम.डी. साहब पर जाँच की आँच भी न पहुँचे.. अर्थात डिमांड और पेमेंट स्थानीय अधिकारी के द्वारा कराया जा रहा है, मगर मूल सूत्र एम.डी. साहब के हाथ में ही है...यही नहीं... यदि भ्रष्टाचार की यह कथा यहीं समाप्त होती तो शायद इसे संयोग कहा जा सकता था। किन्तु वाटर प्यूरीफायर की खरीद ने तो समस्त सीमाएँ ही लाँघ दीं। जिस जल-शुद्धिकरण यंत्र को निर्माता कंपनी लगभग डेढ़ लाख रुपये में उपलब्ध कराती है, उसी उपकरण को बोर्ड ने चार लाख रुपये तक में क्रय किया। संख्या यहाँ भी सौ से अधिक। अर्थात केवल प्यूरीफायर की खरीद में ही ढाई से तीन करोड़ रुपये का खेला हो गया...संस्कृत में भी कहा गया है—"धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।" जब धर्म, नीति और लोकमर्यादा का परित्याग हो जाए, तब पद-प्रतिष्ठा नहीं बचाती; वह केवल दुराचार का आवरण बनकर रह जाती है। अब इस पूरे प्रकरण का सबसे विस्मयकारी पक्ष सुनिए। जिन कार्यालयों में पहले से वाटर कूलर और वाटर प्यूरीफायर पूरी तरह कार्यशील अवस्था में लगे हुए थे, वहाँ भी नए उपकरण भेज दिए गए। परिणाम यह हुआ कि कई स्थानों पर पुराने नहीं हटे, नए उपयोग में नहीं आए और वे सरकारी स्टोरों में धूल फाँक रहे हैं, या फिर किसी परित्यक्त, कबाड़नुमा कक्ष में ढेर बनाकर पटक दिए गए हैं। प्रश्न यह है कि जब आवश्यकता ही नहीं थी, तब खरीद किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हुई? अब आइए उस गठजोड़ की ओर, जिसकी चर्चा बोर्ड और विभाग के गलियारों में धीमे स्वर में होती है। आरोप है कि इस समूचे खेल की पटकथा बोर्ड के एम.डी. साहब और विभाग के मंत्री के ओ.एस.डी. महोदय की जुगलबंदी में लिखी गई। बाहर से दोनों के बीच विरोध का ऐसा अभिनय रचा गया कि देखने वालों को लगा—दोनों एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते। किन्तु सत्ता के बंद कक्षों में होने वाली गोपनीय मंत्रणाएँ कुछ और ही कथा कहती हैं। यही कारण है कि खरीद से लेकर निर्माण कार्यों तक कमीशन की परछाइयाँ एक समान दिखाई देने लगी हैं। गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि विरोध केवल मंच पर था, साझेदारी परदे के पीछे। रामचरितमानस की एक चौपाई स्मरण हो आती है—"होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥" किन्तु यहाँ प्रश्न ईश्वर की इच्छा का नहीं, बल्कि मानवीय कृत्यों का है। यदि निर्णय पहले से तय हों और प्रक्रियाएँ केवल औपचारिकता बन जाएँ, तो शासन व्यवस्था का औचित्य ही संदिग्ध हो जाता है। सूत्र बताते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम में विभाग से जुड़े सचिव महोदय को भी दरकिनार कर दिया गया। कहा जा रहा है कि सचिव इस कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं हैं और अवसर की प्रतीक्षा में हैं, किन्तु फिलहाल उनके हाथ इसलिए बँधे हैं क्योंकि मंत्री और एम.डी. के बीच बनी समीकरणों ने प्रशासनिक संतुलन को निष्प्रभावी कर दिया है। खरीद का अधिकार सीधे एम.डी. के पास है, इसलिए सचिव की असहमति भी फाइलों की धूल में दबकर रह गई। यही वह स्थिति है जिसके लिए संस्कृत में कहा गया है—"यदा यदा हि लोभस्य राज्ये भवति संस्थितिः। तदा तदा विनश्यन्ति न्यायो धर्मश्च शाश्वतः॥" अर्थात जब राज्य पर लोभ का आधिपत्य हो जाता है, तब न्याय और धर्म दोनों क्षीण होने लगते हैं। अब आप यह भी सोच रहे होंगे कि आखिर यह बोर्ड कौन-सा है और विभाग कौन-सा? फिलहाल इतना संकेत पर्याप्त है कि यह वही बोर्ड है जिसका संबंध हम्मालों से है... और यह वही विभाग है, जिससे जुड़े मतदाता हर राजनीतिक दल के लिए चुनावी राजनीति के सबसे बड़े आधार माने जाते हैं। संकेत स्पष्ट हैं, पात्र भी लगभग स्पष्ट हैं; बस नामों का उद्घोष शेष है। खैर, अंत में एम.डी. साहब, आपको यह इत्तला दे रहा हूँ कि आपके द्वारा किए गए इस कृत्य का लेखा-जोखा आपको जल्द ही देना होगा, क्योंकि एक सोशल एक्टिविस्ट और एडवोकेट ने इन सारे मुद्दों की जानकारी लेकर हाईकोर्ट की ओर रुख कर लिया है... वो इसलिए कि ई.ओ.डब्ल्यू. में शिकायत करने पर आप सारे मामले को मैनेज कर लेते, इसलिए उसने जनहित याचिका लगाने का निर्णय किया है... आगे देखते हैं कि परिणाम क्या निकलते हैं, लेकिन उसने भोपाल से ही जिस कंपनी से खरीद की गई है, उसका कोटेशन भी प्रमाणिक तौर पर ले लिया है.

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आरसी मिश्रा
26 Aug 2026

इसे कहते हैं निष्पक्ष पत्रकारिता। यहां दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहेगा।।