Friday, 29 May 2026
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: चुनाव आयोग 2003 की बिहार मतदाता सूची से हटाए गए संदिग्ध नामों को केंद्र सरकार के पास भेजे

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची में सुधार के लिए चुनाव आयोग (ECI) द्वारा चलाए जाने वाले विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) अभ्यास की वैधता को बरकरार रखा है। इसके साथ ही, अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग को एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि साल 2003 की बिहार मतदाता सूची से संदिग्ध नागरिकता के कारण जिन लोगों के नाम हटाए गए थे, उनकी सूची चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को भेजी जाए। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में नाम शामिल करने के सीमित उद्देश्य के लिए नागरिकता के दावों की जांच करने की शक्ति है, लेकिन नागरिकता पर अंतिम फैसला देने का अधिकार केवल नागरिकता अधिनियम के तहत गठित सक्षम प्राधिकारी के पास ही है।

सक्षम प्राधिकारी तय करेंगे नागरिकता, चुनाव से पहले पूरी करनी होगी प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि चुनाव आयोग द्वारा भेजे गए मामलों को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत गठित सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) को सौंपा जाएगा। यह प्राधिकारी संबंधित व्यक्तियों की नागरिकता पर अंतिम कानूनी निर्णय लेगा। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आगामी विधानसभा चुनाव या स्थानीय निकाय चुनाव (जो भी पहले हों) से पहले इस पूरी प्रक्रिया को कानून के अनुसार पूरा किया जाना अनिवार्य है। इस जांच के दौरान संबंधित व्यक्तियों को पूरी पारदर्शिता के साथ नोटिस जारी किया जाएगा और उन्हें अपनी बात रखने तथा सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाएगा।

अगर नागरिकता साबित हुई, तो मतदाता सूची में वापस जोड़ना होगा नाम

अदालत ने प्रभावित नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए साफ किया है कि यदि सक्षम प्राधिकारी अपनी जांच के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि जिन व्यक्तियों के नाम हटाए गए थे, वे वास्तव में भारत के कानूनी नागरिक हैं, तो उनके नाम तुरंत मतदाता सूची में बहाल (Restore) किए जाएंगे। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि बिहार के वे सभी मूल निवासी जिनके नाम अनुपस्थित, मृत, स्थानांतरित (शिफ्टेड) या दोहराव (डुप्लीकेशन) के आधार पर गलती से हटा दिए गए हैं, वे भी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से चुनाव आयोग के इस फैसले को चुनौती दे सकते हैं।

चुनाव आयोग की शक्ति सीमित, नागरिकता पर अंतिम फैसला देने का अधिकार नहीं

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 की वैधानिक आवश्यकताओं के तहत, चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने या संशोधित करने के दौरान नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करने का पूरा अधिकार है। हालांकि, आयोग द्वारा की जाने वाली यह जांच बेहद सीमित उद्देश्य के लिए होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल पात्र लोग ही वोट दे सकें। आयोग की इस कार्रवाई का असर केवल चुनावी अधिकारों तक ही सीमित रहता है, और इसे पूर्ण अर्थों में नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं माना जा सकता।

चुनाव आयोग के नकारात्मक फैसले से किसी की नागरिकता खत्म नहीं होती

सुप्रीम कोर्ट ने राहत देते हुए कहा कि यदि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति का नाम संदिग्ध मानकर मतदाता सूची से हटा देता है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उस व्यक्ति की भारतीय नागरिकता पूरी तरह से समाप्त हो गई है। आयोग का नकारात्मक निर्णय किसी व्यक्ति की नागरिकता को अंतिम रूप से खारिज नहीं कर सकता, क्योंकि नागरिकता छीनने या देने का अंतिम अधिकार केवल नागरिकता अधिनियम, 2003 के तहत केंद्र सरकार के पास है। इसलिए, मतदाता सूची से की गई कोई भी कटौती पूरी तरह से सक्षम प्राधिकारी के अंतिम फैसले के अधीन रहेगी।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को बढ़ावा देती है आयोग की संशोधन प्रक्रिया

यह फैसला एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य संगठनों द्वारा दायर याचिकाओं के एक बैच पर आया है, जिसमें बिहार में विशेष गहन संशोधन (SIR) आयोजित करने की चुनाव आयोग की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा कि चुनाव आयोग का यह कदम देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव (Free & Fair Elections) सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ता है। कोर्ट के इस फैसले से अब साफ हो गया है कि मतदाता सूचियों को शुद्ध रखने के प्रशासनिक प्रयासों और नागरिकों के वैध अधिकारों के बीच एक कानूनी संतुलन बना रहेगा।

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