Thursday, 27 August 2026
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मध्य प्रदेश

100 करोड़ की खरीदारी में एमडी के साथ कमिश्नर और मंत्री की भी नज़र

News desk bhopal: कहा गया है—..."यथा राजा तथा प्रजा।".....साथ ही लोक में एक कहावत भी है कि, "जब कुएँ में ही भांग पड़ी हो, तो पूरे गाँव के नशे में होने पर आश्चर्य कैसा?" प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ऐसा ही बोर्ड इन दिनों सत्ता, सुविधा और संसाधनों की त्रिवेणी का केंद्र बना हुआ है, जहाँ नियम पुस्तिका अलमारी में रखी रहती है और व्यवस्थाएँ रसूख के इशारों पर चलती हैं।..रामचरितमानस की यह चौपाई भी यहाँ सटीक बैठती है—"समरथ को नहिं दोष गुसाईं। रवि पावक सुरसरि की नाईं॥" अर्थात सामर्थ्यवान के दोष भी अक्सर गुण मान लिये जाते हैं। शायद इसी दर्शन को राजधानी में स्थित एक बोर्ड ने अपना प्रशासनिक सिद्धांत बना लिया है।..कहानी शुरू होती है उन मैडम से, जिन्हें मौजूदा कुर्सी से इतना प्रेम हो गया है कि मोहतर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा का सम्मान मिलने के बाद भी कुर्सी का अनुराग नहीं छोड़ पा रही हैं। अर्थात आई.ए.एस. अवार्ड होने के बाद भी उन्हें संयुक्त संचालक का पद ही रास आ रहा है। क्यों नहीं... "ये दुनिया है काला बाज़ार... जहाँ पैसा बोलता है..." फिर आई.ए.एस. की कुर्सी क्या मायने रखती है, जबकि संयुक्त संचालक का पद डिप्टी कलेक्टर या अपर कलेक्टर के समकक्ष है।...हाँ, महोदया को आई.ए.एस. होने का तमगा मिला, तो जिम्मेदारी बढ़ने के नाम पर उनके चेम्बरों की संख्या जरूर बढ़ गई। अब बोर्ड की एक ही इमारत में उनके दो-दो आलीशान चेम्बर हो गए हैं—एक आई.ए.एस. अधिकारी का और दूसरा संयुक्त संचालक का। ऐसे में फिल्म शान का गीत याद आता है—..."ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे..." बस फर्क इतना है कि यहाँ दोस्ती किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि मलाईदार कुर्सी से है। खैर, अब टटोहते हैं मैडम के दरवाजे पर लक्ष्मी के आगमन की कथा को... तो बोर्ड के गलियारों में यह चर्चा आम हो गई है कि प्रदेश भर के फील्ड में पदस्थ किसी-न-किसी अधिकारी की मैडम के यहाँ हर दूसरे-तीसरे दिन पेशी होती है। और पेशी मुकर्रर होने के साथ ही लक्ष्मी जी का वाहन मैडम के चेम्बर की ओर रुख कर लेता है। इतना ही नहीं... बोर्ड के कर्मचारियों के बीच खुसर-पुसर तो यहाँ तक हो रही है कि कई बार संबंधित अधिकारियों के साथ मैडम खरीदारी के लिए भी निकल पड़ती हैं। अब खरीदारी यदि शाही हो, तो भुगतान भी साधारण कैसे होगा? यहाँ यह शायरी मौजूँ है कि—"बाज़ार में रिश्तों की कीमत नहीं लगती... मगर एहसानों का हिसाब अक्सर बिलों में लिखा जाता है।"ये तो बात हुई संयुक्त संचालक साहिबा की....अब मिलते हैं बोर्ड के एम.डी. साहब से... मैडम का दरबार मासिक है, तो एम.डी. साहब का दरबार त्रैमासिक और अर्धवार्षिक है। लेकिन कहते हैं—.."राजा की एक भौंह का इशारा, मंत्री के सौ आदेशों पर भारी पड़ता है।" तो एम.डी. साहब के दरबार में क्षेत्रीय अधिकारियों और कर्मचारियों की वर्ष में दो से तीन, तो कभी चार बार भी पेशी हो जाती है। और वह पेशी ऐसी कि अधिकारी-कर्मचारी दरबार से बाहर निकलते ही अपना भविष्य पढ़ने लगते हैं। यदि साहब की फरमाइश पूरी हो गई, तो पोस्टिंग सुरक्षित... नहीं तो..."बोरिया-बिस्तर बाँधिए और नई मंज़िल की तैयारी कीजिए।" हाँ... साहब का प्रशासनिक इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं है। जनाब का अधिकांश प्रशासनिक जीवन मलाईदार विभागों में ही बीता है। कई जिलों की कलेक्टरी करने के साथ-साथ ज्यादातर समय निर्माण और वसूली वाले विभागों में ही जमे रहे हैं। साहब के बारे में यह चर्चा आम है कि वे जहाँ भी रहे, वहाँ संसाधनों का "सदुपयोग" करना खूब जानते रहे।चलिये, अब खुदुर-बुदुर करते हैं बोर्ड की असली कहानी को, जो तुलसीदास की इस चौपाई के ठीक उलट है—"लोभ पाप को मूल है, लोभ मिटावत मान। लोभ कभी नहिं कीजिये, या में नरक समान॥" यानी कथा का केंद्र बिंदु है करोड़ों रुपये की मशीनरी खरीददारी का। दरअसल, इस बोर्ड को केंद्र सरकार से अरबों रुपये की अनुदान राशि प्राप्त हो रही है, जिसके मद से बोर्ड की विभिन्न परियोजनाओं में लगभग 100 करोड़ रुपये की मशीनरी खरीदी जानी है। टेंडर की प्रक्रिया भी जल्द शुरू होने वाली है। बस यहीं से शुरू होती है सत्ता, व्यवस्था और स्वार्थ की त्रिकोणीय गाथा, क्योंकि इस टेंडर प्रक्रिया पर केवल एम.डी. साहब की ही नहीं, बल्कि विभाग के कमिश्नर और मंत्री महोदय की भी गिद्ध-दृष्टि पड़ चुकी है। ऐसे में कहानी दिलचस्प मोड़ ले चुकी है। अनार एक है और खाने के लिए दावेदार तीन... मगर अनार भी लगभग सौ करोड़ का है। आगे जानने के लिए इंतजार कीजिए टेंडर जारी होने के दिन और तारीख का । अंत में स्वराज एक्सप्रेस यह बयां कर रहा है कि, "जब बाड़ ही खेत चरने लगे, तो उस खेत की रखवाली खुदा भी नहीं कर सकता।"

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