रिपोर्ट: मनोहर प्रजापति, गुना (मध्यप्रदेश): गुना जिले के शिक्षा विभाग में सामने आए 1 करोड़ 47 लाख 96 हजार 896 रुपए के गबन ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब तक करीब 77 लाख 34 हजार रुपए की रिकवरी हो चुकी है, लेकिन 70 लाख 62 हजार रुपए की राशि अभी भी गायब है। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारी आज भी अहम पदों पर बने हुए हैं।
जांच में खुली पोल, कार्रवाई ‘जीरो’
संभागीय संयुक्त संचालक कोष एवं लेखा, ग्वालियर द्वारा कराई गई जांच में वित्तीय वर्ष 2018-19 से लेकर पांच वर्षों तक के भुगतान में भारी अनियमितताएं और गबन सामने आया।
जांच रिपोर्ट में आहरण एवं संवितरण अधिकारी (DDO), क्रिएटर और अप्रूवर की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से चिन्हित की गई थीं।
इसके बावजूद कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रही, जबकि निर्णय लेने वाले अधिकारी बचते नजर आए।
कार्रवाई का गणित: छोटे सस्पेंड, बड़े सुरक्षित
मामले में
- मुनेंद्र लोधी – निलंबित, बाद में बहाल
- दीपेश दुबे – निलंबित, बाद में बहाल
- रवि बघेल – निलंबित
वहीं कई अधिकारी रिटायर हो चुके हैं, जबकि कुछ आज भी प्राचार्य और DIET संस्थानों में पदस्थ हैं। एक अधिकारी तो वर्तमान में जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत है।
यानी जिनके कार्यकाल में गबन हुआ, वही आज सिस्टम संभाल रहे हैं।
कलेक्टर के आदेश भी ठंडे बस्ते में
12 जनवरी 2024 को कलेक्टर कार्यालय गुना ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि दोषियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ एफआईआर दर्ज की जाए।
लेकिन आरोप है कि तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी ने इन निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
बड़े नाम, बड़ी कुर्सियां… फिर भी कार्रवाई नहीं
जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आई, वे आज भी
- प्राचार्य पद पर
- DIET संस्थानों में
- जिला शिक्षा अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर
कार्यरत हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या जिम्मेदारी तय करने का कोई सिस्टम बचा ही नहीं है।
सबसे बड़े सवाल
- क्या कार्रवाई सिर्फ छोटे कर्मचारियों तक सीमित है?
- क्या बड़े अधिकारियों के लिए नियम अलग हैं?
- क्या भोपाल तक पहुंचते-पहुंचते फाइलें रुक जाती हैं?
- क्या जांच सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है?
सिस्टम पर सवाल, जवाबदेही पर संकट
गुना का यह मामला सिर्फ एक वित्तीय गबन नहीं, बल्कि प्रशासनिक सिस्टम की नाकामी का उदाहरण बन गया है।
जब डेढ़ करोड़ रुपए के गबन के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी कुर्सियों पर बने रहें, तो यह साफ संकेत है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि कहीं न कहीं संरक्षण मिल रहा है।
यह वही पुराना पैटर्न दिखाता है—
नीचे वाले बलि का बकरा, ऊपर वाले सुरक्षित।
क्या कानून से ऊपर हैं बड़े अफसर?
अगर जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो ऐसी जांच का औचित्य क्या है?
सबसे गंभीर बात यह है कि कलेक्टर स्तर के निर्देशों के बावजूद एफआईआर तक दर्ज नहीं होती। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
यदि ऐसे मामलों में भी सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो संदेश साफ है—
भ्रष्टाचार करो, सिस्टम तुम्हारे साथ है।
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Comments (2)
Bhut Sundar
यह देश भ्रष्टाचार मुक्त हो , जय हिन्द , भारत माता की जय , वंदे मातरम्।