“सत्यमेव..जयते..नानृतम्।
सत्येन पन्था विततो देवयानः।”
यानी सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं... और सत्य ही वह रास्ता है जो सही मंजिल तक ले जाता है। लेकिन जब सवाल सत्ता, पुलिस की वर्दी, रिश्तों और प्रभाव का हो... जब एक तरफ विभागीय जांच की तलवार लटक रही हो और दूसरी तरफ परिवार गंभीर आरोपों के साथ सरकार के दरवाजे खटखटा रहा हो... तब सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रहता, सवाल पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर उठता है।
कटनी के पूर्व एसपी अभिजीत रंजन की मुश्किलें साल बीत जाने के बाद भी कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। एक तरफ उन पर विभागीय जांच की तलवार लटक रही है, तो दूसरी तरफ अब ख्याति मिश्रा के परिवार की ओर से लगाए जा रहे आरोपों ने इस पूरे मामले को फिर से सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।
ख्याति मिश्रा की नानी ने लगाए गंभीर आरोप
ख्याति मिश्रा की सगी नानी कुसुम द्विवेदी का आरोप है कि अभिजीत रंजन अभी भी ख्याति मिश्रा के संपर्क में हैं और ख्याति पर डिजिटल माध्यमों से हर समय निगरानी रख रहे है। शिकायत में दावा किया गया है कि ख्याति की गतिविधियों पर इस तरह नजर रखी जा रही है कि वह मानसिक रूप से अभिजीत रंजन के प्रभाव और नियंत्रण में बनी रहें और अपने परिवार के संपर्क में न आ सकें।
कुसुम द्विवेदी ने यह आरोप लगाते हुए डीजीपी और मुख्यमंत्री के साथ-साथ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी लिखित शिकायत की है।
शिकायत में एक और बेहद गंभीर आरोप लगाया गया है कि अभिजीत रंजन ने ख्याति मिश्रा को इस तरह अपने प्रभाव में रखा है कि वह अपने आठ साल के मासूम बच्चे तक से नहीं मिल रही हैं।
अब यह आरोप कितना सच है, इसके पीछे वास्तविकता क्या है, और क्या वास्तव में ख्याति मिश्रा पर किसी तरह का डिजिटल या मानसिक प्रभाव है... इसका जवाब सिर्फ एक निष्पक्ष और तकनीकी जांच ही दे सकती है।
मोबाइल रिकॉर्ड और डिजिटल जांच पर सवाल
क्योंकि यहां मामला सिर्फ किसी रिश्ते या व्यक्तिगत विवाद का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि क्या अभिजीत और ख्याति के बीच अभी भी संपर्क है? क्या उनके मोबाइल रिकॉर्ड इसकी पुष्टि करते हैं? क्या सीडीआर से कोई तस्वीर सामने आती है? क्या डिजिटल डिवाइस की जांच से परिवार द्वारा लगाए जा रहे आरोपों की पुष्टि या खंडन हो सकता है? और अगर ये आरोप गलत हैं तो फिर जांच से बेहतर रास्ता क्या हो सकता है?
अभिजीत रंजन के खिलाफ विभागीय जांच की स्थिति
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आपको बता दें कि करीब एक साल पहले अभिजीत रंजन को कटनी एसपी के पद से हटा दिया गया था। यह कार्रवाई इसी प्रकरण से जुड़े घटनाक्रम के बीच हुई थी।
इसके बाद अभिजीत रंजन की प्राथमिक जांच हुई और प्राथमिक जांच के बाद डीजीपी ने विभागीय जांच की अनुशंसा करते हुए फाइल शासन को भेज दी।
अब शासन मे विभागीय जांच की फाइल क्यो और कहां दबी है यह भी जटिल सवाल है लेकिन अगर डीजीपी ने फाइल भेजी है तो फिर शासन से अनुमति कभी भी मिल सकती है।
ख्याति मिश्रा पर नशा तस्करों को संरक्षण देने के आरोप
लेकिन ख्याति और अभिजीत की कहानी का दूसरा सिरा भी उतना ही गंभीर है... क्योंकि ख्याति मिश्रा के खिलाफ भी अब मैहर जिले के अमरपाटन में नशा तस्करों को संरक्षण देने के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
ये आरोप अमरपाटन के सरपंच संघ के अध्यक्ष की ओर से लगाए गये है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जब से ख्याति मिश्रा अमरपाटन की एसडीओपी बनी हैं, तब से इलाके में शराब, गांजा और कोरेक्स की तस्करी बढ़ गई है।
इतना ही नहीं शिकायत में साफ तौर पर यह आरोप लगाया गया है कि ख्याति मिश्रा के संरक्षण में प्रधान आरक्षक रवि सिंह कथित वसूली कर रहे हैं।
जाहिर है आरोप बेहद गंभीर हैं... क्योंकि जिस पुलिस व्यवस्था की जिम्मेदारी अवैध नशे के कारोबार पर लगाम लगाने की है, अगर उसी व्यवस्था के किसी अधिकारी पर नशा तस्करी को संरक्षण देने के आरोप लगाए जाएं, तो सवाल सिर्फ एक अधिकारी पर नहीं रुकता... सवाल पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पहुंच जाता है।
अमित शाह के नशामुक्त मध्यप्रदेश के संकल्प के बीच सवाल
और यह मामला ऐसे वक्त में सामने आया है जब दो दिन पहले ही तीन अक्टूबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री ने एक साथ नशा मुक्त मध्यप्रदेश बनाने का संकल्प लिया है।
एक तरफ सरकार नशे के खिलाफ बड़ा अभियान और संकल्प लेकर आगे बढ़ने की बात कर रही है... और दूसरी तरफ एक महिला पुलिस अधिकारी पर नशा तस्करी को संरक्षण देने के आरोप सामने आ रहे हैं जो गम्भीर नही गम्भीरतम है।
सरकार से सीधे सवाल
क्योंकि सवाल बहुत सीधे हैं... क्या सरकार अभिजीत रंजन और ख्याति मिश्रा के बीच कथित संपर्क की जांच के लिए सीडीआर, मोबाइल रिकॉर्ड और डिजिटल डिवाइस की जांच कराएगी?
क्या डिजिटल निगरानी के आरोपों की तकनीकी जांच होगी?
क्या यह पता लगाया जाएगा कि दोनों के बीच वास्तव में संपर्क है या नहीं?
क्या अमरपाटन में नशा तस्करी बढ़ने के आरोपों की स्वतंत्र जांच होगी?
और अगर जांच नहीं होती... तो फिर सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्यों नहीं होती?
क्या दोनों को किसी बड़े अधिकारी का संरक्षण हासिल है?
हालांकि यह बात भी सही है कि सिर्फ आरोप लग जाने से कोई व्यक्ति दोषी नहीं हो जाता। किसी भी अधिकारी को दोषी मानने से पहले निष्पक्ष जांच, सबूत और कानूनी प्रक्रिया जरूरी है।
लेकिन लोकतंत्र में शिकायतों का जवाब खामोशी से नहीं, निष्पक्ष जांच से ही दिया जाता है।
अगर आरोप झूठे हैं तो जांच उन्हें झूठा साबित कर सकती है... और अगर आरोपों में सच्चाई है तो वही जांच दोषियों तक पहुंचने का रास्ता खोल सकती है।
जब रिश्ता सवाल बन जाए
कभी किसी शायर ने कहा था—
“मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले...”
लेकिन जब किसी रिश्ते की कहानी परिवार की शिकायतों, डिजिटल निगरानी के आरोपों और सरकारी जांच की मांग तक पहुंच जाए, तो फिर यह कहानी...कहानी नहीं रह जाती... यह सवाल बन जाती है।
और शायद इसीलिए कहा गया है कि “धर्मो रक्षति रक्षितः”, अर्थात जो धर्म और न्याय की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं न्याय करता है।
अब इस पूरे मामले में भी जरूरत किसी पक्ष को बचाने की नहीं... जरूरत है सच को सामने लाने की।
जांच से ही साफ होगी तस्वीर
क्योंकि अगर कुसुम द्विवेदी के आरोप गलत हैं, तो जांच उन आरोपों का पटाक्षेप कर सकती है...
अगर आरोप सही हैं, तो कार्रवाई का रास्ता खुलना चाहिए।
अगर अभिजीत रंजन और ख्याति मिश्रा के बीच कोई संपर्क नहीं है, तो सीडीआर और डिजिटल जांच यह साफ कर सकती है...
और अगर नशा तस्करी तथा कथित वसूली के आरोप निराधार हैं, तो जांच उन्हें भी खारिज कर सकती है।
लेकिन जांच से बचना किसी भी सवाल का जवाब नहीं है।
अब सरकार के सामने सबसे बड़े सवाल
सवाल आज भी वहीं खड़ा है...
क्या सरकार इन आरोपों की तह तक जाएगी?
क्या मोबाइल, सीडीआर और डिजिटल डिवाइस की जांच होगी?
क्या विभागीय जांच को आगे बढ़ाया जाएगा?
क्या नशा तस्करी और कथित वसूली के आरोपों की निष्पक्ष पड़ताल होगी?
क्योंकि आखिर में बात सिर्फ अभिजीत की नहीं है... बात सिर्फ ख्याति की नहीं है... बात सिर्फ कुसुम द्विवेदी की शिकायत की नहीं है...
बात उस भरोसे की है जो आम आदमी पुलिस की वर्दी पर करता है।
और इसीलिए इस पूरी कहानी का अंत किसी आरोप से नहीं, बल्कि एक सवाल से होना चाहिए—
अगर आरोप गलत हैं तो जांच से डर कैसा... और अगर आरोप सही हैं तो कार्रवाई में देर कैसी?
क्योंकि “सत्यमेव जयते” सिर्फ सरकारी भवनों पर लिखा हुआ एक वाक्य नहीं है... यह व्यवस्था के लिए एक जिम्मेदारी है।
अब देखना यही है कि सरकार इस शिकायत को महज एक कागज मानती है... या फिर उस कागज पर लिखे सवालों की तह तक जाकर सच सामने लाती है।
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