नई दिल्ली: जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच कर रही लोकसभा की समिति ने अपनी रिपोर्ट में उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को साबित माना है। समिति ने कहा है कि जज के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में ऐसे भारतीय करेंसी नोट मिले थे, जिनका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसके अलावा, बरामद नोटों से जुड़े सबूतों को सुरक्षित नहीं रखने और अपने जवाबों में टालमटोल व भ्रामक रवैया अपनाने का आरोप भी समिति ने सही पाया है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा अगस्त 2025 में जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत गठित समिति की रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में पेश की गई। समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीन आरोप तय किए थे। पहला आरोप सरकारी आवास में बेहिसाब नकदी मिलने और उसके कब्जे से जुड़ा था। दूसरा आरोप बरामद नकदी से जुड़े महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित नहीं रखने का था। तीसरा आरोप नकदी मिलने के संबंध में जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए कथित भ्रामक और असंतोषजनक जवाबों से संबंधित था।
सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिले ₹500 के नोट
समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, मामला नई दिल्ली के 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के एक स्टोर रूम में मिले भारतीय करेंसी नोटों से जुड़ा है। 14-15 मार्च 2025 की रात वहां आग लगने के बाद मौके पर पहुंचे दिल्ली फायर सर्विस और पुलिसकर्मियों ने बड़ी संख्या में ₹500 के नोट देखे थे।
गवाहों ने इन नोटों को बंडलों, ढेर और बिखरी हुई हालत में मौजूद बताया। रिपोर्ट के अनुसार कुछ नोट जले हुए, कुछ आधे जले हुए और कुछ गीले थे। समिति ने कहा कि इस मामले में फोटो और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री भी मौजूद थी, जो वहां करेंसी होने की बात को समर्थन देती है।
हालांकि, नोटों को सही तरीके से सुरक्षित और जब्त नहीं किए जाने के कारण यह तय नहीं किया जा सका कि स्टोर रूम में वास्तव में कितनी रकम मौजूद थी। समिति ने कहा कि सरकारी आवास में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी मिलना महत्वपूर्ण तथ्य है और जस्टिस वर्मा इस संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके।
स्टोर रूम तक पहुंच को लेकर क्या कहा गया?
जस्टिस वर्मा की ओर से यह तर्क दिया गया था कि स्टोर रूम उनके आधिकारिक आवास से अलग था और उन्हें वहां पहुंच हासिल नहीं थी। हालांकि, समिति ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
समिति ने कहा कि स्टोर रूम सरकारी आवासीय परिसर का हिस्सा था और वहां बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के बावजूद उसके स्रोत, मौजूदगी और स्वामित्व को लेकर जस्टिस वर्मा की ओर से पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
हालांकि, समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी रिपोर्ट में करेंसी नोटों के सीधे व्यक्तिगत स्वामित्व का कोई आपराधिक निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। समिति के अनुसार जो तथ्य स्थापित हुआ, वह यह है कि जज के आधिकारिक परिसर में बड़ी मात्रा में अस्पष्टीकृत करेंसी मिली और जस्टिस वर्मा उसकी मौजूदगी, स्रोत या स्वामित्व के बारे में संतोषजनक जवाब देने में विफल रहे।
सबूत सुरक्षित नहीं रखने पर भी सवाल
जांच समिति ने आग लगने के बाद बरामद नोटों और स्टोर रूम की स्थिति को सुरक्षित नहीं रखने को पुलिस की ओर से भी गंभीर चूक माना। समिति के मुताबिक नोटों को जब्त नहीं किया गया, उनकी सही सूची तैयार नहीं हुई और न ही तत्काल कोई उचित पंचनामा तैयार किया गया।
स्टोर रूम को भी तुरंत सील नहीं किया गया। शुरुआती अधिकारियों के वहां से चले जाने के बाद सफाई किए जाने की बात भी सामने आई। इसके बाद करेंसी नोट उपलब्ध नहीं रहे, जिससे मामले में मौजूद महत्वपूर्ण भौतिक सबूतों को सुरक्षित रखना संभव नहीं हो सका।
समिति ने जस्टिस वर्मा के घरेलू स्टाफ से जुड़े लोगों की भूमिका का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस वर्मा के निजी सचिव राजिंदर सिंह करकी और घरेलू कर्मचारी मोहम्मद राहिल के घटना के बाद स्टोर रूम के आसपास होने और सफाई में शामिल होने की गवाही सामने आई।
हालांकि समिति ने यह नहीं कहा कि जस्टिस वर्मा ने खुद जाकर नकदी हटाई थी। समिति का निष्कर्ष यह था कि उन्हें घटना की जानकारी होने और परिसर से जुड़े लोगों के संपर्क में रहने के बावजूद महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित रखने, उनकी सूची बनवाने या रिपोर्ट करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए थे।
जस्टिस वर्मा के जवाब को समिति ने बताया ‘टालमटोल वाला’
समिति ने जस्टिस वर्मा के बचाव और उनके जवाबों को भी गंभीरता से लिया। रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआत में उन्होंने सरकारी आवास में किसी भी तरह की बेहिसाब नकदी होने के दावे को पूरी तरह खारिज किया था। बाद में उनका बचाव नोटों को जब्त नहीं किए जाने, उन्हें प्लांट किए जाने या किसी बड़ी साजिश की संभावना की ओर बदल गया।
समिति ने कहा कि इन दावों के समर्थन में जस्टिस वर्मा की ओर से कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया और न ही बचाव पक्ष के गवाहों की कोई सूची दी गई।
समिति ने उनके जवाब को “टालमटोल वाला, अधूरा और प्रभाव में भ्रामक” माना। पैनल के मुताबिक जवाब में स्वतंत्र अधिकारियों द्वारा देखी गई बड़ी मात्रा में करेंसी की मौजूदगी को पर्याप्त तरीके से स्पष्ट नहीं किया गया। साथ ही यह भी नहीं बताया गया कि कथित साजिश या गड़बड़ी को लेकर कौन-सी जांच की गई और घटनास्थल पर मौजूद सबूतों को सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाए गए।
कार्यवाही से अलग हो गए थे जस्टिस वर्मा
समिति ने यह भी नोट किया कि पेश करने वाले पक्ष की गवाही और गवाहों की जिरह पूरी होने के बाद जस्टिस वर्मा जांच की कार्यवाही से हट गए थे। समिति ने स्पष्ट किया कि केवल कार्यवाही से हटना अपने आप में आरोप साबित करने का आधार नहीं है। हालांकि, उनके द्वारा अपने आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत पेश न किए जाने के संदर्भ में समिति ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा।
कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?
यह पूरा मामला मार्च 2025 में नई दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में लगी आग के बाद सामने आया था। आग बुझाने के दौरान स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में कथित तौर पर बेहिसाब नकदी मिलने की बात सामने आई थी। इसके बाद इस मामले ने न्यायपालिका और संसद दोनों में गंभीर बहस को जन्म दिया।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को मामले की जांच के लिए समिति का गठन किया था। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार ने की। इसमें तत्कालीन बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य भी शामिल थे। समिति ने अपनी रिपोर्ट 18 मई 2026 को लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने आरोपों से इनकार किया था और 10 अप्रैल को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था।
अब लोकसभा में समिति की रिपोर्ट पेश होने के बाद इस मामले में आगे की संसदीय प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। समिति द्वारा तीनों आरोपों को साबित माने जाने से जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों पर बहस एक बार फिर तेज होने की संभावना है।
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