“जाकी रही भावना जैस,,,प्रभु मूरत देखी तिन तैसी अर्थात व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही उसे दिखने भी लगता है। जी हाँ, इन दिनों प्रदेश की एक मंत्राणी जी को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में खूब चर्चा चल रही है।कहा जा रहा है कि विभागीय व्यवस्थाओं और उनसे जुड़ी गतिविधियों को लेकर जब मंत्राणी जी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तब मैडम ने प्रत्यक्ष रूप से विभाग में हो रहे ऐसे कामों से दूरी बना ली, मगर विभाग में जो स्वेच्छा से मुद्रा आती रही, उसे ठुकराने का भाव भी नहीं दिखाया।इसी बीच उनके ज्ञान-पाड़े पी.ए. ने उन्हें यह ज्ञान दे दिया कि उनके प्रभार वाला जिला संपत्ति के मामले में ज्यादा उर्वरक है। सो, मंत्राणी जी अपने प्रभारी जिले पर कुछ अधिक ही मेहरबान हो गईं। कहते हैं कि इस पूरी रणनीति के पीछे उनके ज्ञान-पाड़े पी.ए. की भूमिका प्रमुख रही।पी.ए. साहब वैसे भी सत्ता के गलियारों के पुराने खिलाड़ी बताए जाते हैं। पहले भी बुंदेलखंड से आने वाले एक प्रभावशाली मंत्री के साथ रहकर उन्होंने प्रशासनिक चालें, संपर्कों की बिसात और व्यवस्था की बारीकियाँ खूब समझी थीं। कहा जाता है कि “पुराना खिलाड़ी पत्ते कम और दाँव ज्यादा खोलता है।”बस फिर क्या था, मंत्राणी जी को भी ऐसा रास्ता सुझाया गया कि “न नौ मन तेल लगे, न राधा नाचे” और काम भी बन जाए।चर्चा है कि जैसे ही मंत्राणी जी का प्रतिमाह होने वाला प्रभारी जिले का दौरा तय होता है, निजी सहायक दो दिन पहले ही वहाँ पहुँच जाते हैं। उसके बाद अलग-अलग विभागों से कमीशन की राशि संग्रहीत होने लगती है। विशेष रूप से खनिज, परिवहन और मंत्राणी जी के विभाग को लेकर सबसे अधिक कानाफूसी सुनाई देती है।चर्चा तो यहाँ तक है कि हर दौरे के दौरान होने वाले कथित संग्रहण की राशि लगभग पचास लाख रुपये तक पहुँच जाती है। मगर यहाँ मजे की बात यह है कि मंत्राणी जी को यह पता ही नहीं चलता कि संग्रहीत होने वाली राशि कितनी है। ऐसे में आधे से भी ज्यादा की राशि खुद पी.ए. साहब गटक जाते हैं।मामला तब और दिलचस्प हो गया जब स्थानीय सांसद और जिले के विधायकों तक पी.ए. साहब की इस कारस्तानी की खबर लगी। तब उन्होंने मंत्राणी जी से पी.ए. साहब की शिकायत की। शिकायत को मंत्राणी जी ने गंभीरता से सुना और पी.ए. साहब पर लगाम लगाने का आश्वासन भी दिया।मगर हुआ उल्टा। अगले दौरे में सांसद और विधायकों की होने वाली बैठक में ज्ञान का भंडार लेकर खुद पी.ए. साहब भी बैठे नजर आए। नतीजन बेचारे माननीय एक-दूसरे का मुँह ताकने के अलावा कुछ नहीं कर पाए। कर भी क्या सकते थे—जिसकी शिकायत की थी, वही बैठक में ज्ञान बघार रहा था।इसके बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच यह चर्चा शुरू हो गई कि मौका देखकर इस विषय को सीधे मुख्यमंत्री तक पहुँचाया जाए या संगठन स्तर पर रखा जाए।निर्णय भले बाहर न आया हो, पर राजनीतिक हलकों में यह टिप्पणी खूब सुनाई दे रही है कि मंत्राणी जी अभी इस खेल की नई-नवेली खिलाड़ी हैं, मगर उनके निजी सहायक तो “घाट-घाट का पानी पिए हुए” माने जाते हैं। ऐसे में पी.ए. साहब की बल्ले-बल्ले हो रही है।वैसे भी कमीशन की उगाही का हिसाब किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं होता और न ही कोई लिखित ब्योरा चलता है। ऐसे में कौन कितना लाया और कितना कहाँ पहुँचा—यह मंत्राणी जी कैसे पूछें? ज्ञान-पाड़े ने जो बताया, वही मान लिया।लेकिन तबादला सीजन में मंत्राणी जी थोड़ी चौकस दिखीं, क्योंकि उन्होंने प्रभार वाले जिले में जो भी ट्रांसफर होने थे, उन सबका एक तय रेट निर्धारित कर दिया, जिससे पी.ए. साहब के ज्ञान-चक्षुओं पर पूर्ण विराम लग गया।हाँ, यहाँ पी.ए. साहब की एक और खासियत चर्चा में है—वो ये कि हर दौरे में उनका ठहरने का स्थान बदल जाता है; कभी कोई अतिथि गृह, कभी कोई विश्राम गृह। शायद सोच यह रहती हो कि “न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।”मगर राजनीति की दुनिया में एक कहावत बहुत पुरानी है—“इश्क, मुश्क और सत्ता के किस्से ज्यादा दिन छिपते नहीं।” जब धुआँ बार-बार उठे, तो लोग आग तलाशने ही लगते हैं।
मंत्राणी अनजान, PA मालामाल? सांसद-विधायकों की शिकायत के बाद भी जारी है कमीशनखोरी का खेल!
Comments
Leave a Reply
Comments (1)
uMeyouoeMjRJUnJXA