"राजधर्म जब रईसी का दास बन जाए, तो शासन नहीं, शौक़ फरमान सुनाने लगते हैं।"
प्रदेश की आर्थिक राजधानी में पदस्थ एक आई.ए.एस. अधिकारी के 'शौक' और 'फरमान' का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि वे अपने पिताश्री तीर्थाटन के लिए एक ठेकेदार से इनोवा क्रिस्टा लेते हैं, और तीन महीने बीत जाने के बाद भी न गाड़ी लौटती है, न उसका गरीब ड्राइवर।
यह अनोखा किस्सा तब शुरू होता है, जब साहब के पूज्य पिताश्री का पुत्र-मोह फड़फड़ाया तो वे मिलन के लिए मालवा की धरती पर पधार गए। जब बेटे के पास पधार ही गए, तो आई.ए.एस. बेटे के जलजले का जायज़ा लेना भी बनता था। नतीजतन बेटे ने भी भरपूर पुत्रधर्म निभाया, मगर धनबल का सारा भार बेचारे एक ठेकेदार के कंधों पर लाद दिया।
साहब के पी.ए. द्वारा ठेकेदार को आदेश मिला कि पूज्य पिताश्री मालवा के आस-पास के तीर्थस्थलों का भ्रमण करना चाहते हैं, इसलिए तत्काल एक इनोवा क्रिस्टा उपलब्ध कराई जाए। बेचारे ठेकेदार के पास स्वयं इनोवा नहीं थी, इसलिए उसने एक ट्रैवल एजेंसी से किराये पर इनोवा क्रिस्टा अरेंज कर साहब के आदेश का पालन किया।
तत्पश्चात सप्ताहभर तक प्रदेश के तीर्थस्थलों का भ्रमण सम्पन्न हुआ। इसके बाद पिताश्री को वापस घर जाना था, सो वही इनोवा उन्हें लेकर गृह राज्य रवाना हो गई।
किस्सा-कोताहा यहीं समाप्त नहीं हुआ। तीन महीने बीत गए... न इनोवा लौटी और न ही चालक। उधर ट्रैवल एजेंसी के संचालक का धैर्य जवाब देने लगा। एजेंसी संचालक रोज़ ठेकेदार का दरवाज़ा खटखटाकर खरी-खोटी सुना रहा है। उधर इनोवा के ड्राइवर का परिवार भी परेशान है कि आखिर तीन महीने हो गए, उनका सदस्य यानी ड्राइवर कब घर लौटेगा।
इधर ठेकेदार की स्थिति इस कहावत को चरितार्थ कर रही है कि "भई गति साँप-छछूंदर की... न उगलत बने, न लीलत बने..." एक ओर ट्रैवल एजेंसी की रोज़ की दबिश, दूसरी ओर साहब के अधीन करोड़ों रुपये के निर्माण कार्य। यदि साहब से वाहन के बारे में पूछ लिया, तो कहीं फाइलों में ऐसी आपत्तियाँ न निकल आएँ कि करोड़ों का भुगतान ही वर्षों के लिए अटक जाए।
ऐसे में बेचारे ठेकेदार द्वारा साहब के अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से यह विनती भी कराई जा रही है कि भले ही इनोवा क्रिस्टा पिताश्री की सेवा में लगी रहने दें, मगर ड्राइवर को वापस भिजवा दें। अगर वे चाहें, तो दूसरा ड्राइवर भिजवा दिया जाएगा। लेकिन चर्चा है कि ठेकेदार का यह प्रस्ताव भी अभी विचाराधीन ही है। उधर ठेकेदार ट्रैवल एजेंसी को यह दिलासा दे रहा है कि जितने दिन तक वाहन बाहर रहेगा, उसका पूरा भुगतान बाज़ार दर से अदा कर दिया जाएगा।
बहरहाल, चलते-चलते स्वराज एक्सप्रेस की पड़ताल... जब स्वराज एक्सप्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम की परतें खंगालीं, तो पता चला कि संबंधित इनोवा क्रिस्टा की लोकेशन महाराष्ट्र और बिहार की सीमा में मिल रही है।
अब प्रश्न यह है कि आखिर यह भुगतान और यह शोषण किस मजबूरी की कीमत है—व्यापार की या सत्ता के भय की?
दरअसल, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि यहाँ राजा नहीं, बल्कि प्रशासनिक कुर्सी पर विराजमान एक ऐसे आई.ए.एस. अधिकारी की चर्चा है, जिनकी कार्यशैली ने ठेकेदारों के बीच यह धारणा बना दी है कि सरकारी निविदा तभी पूरी मानी जाती है, जब उसके साथ 'कमीशन' और 'खिदमत' दोनों की आपूर्ति हो।
जी हाँ... आई.ए.एस. अधिकारी महोदय के बारे में विभाग से जुड़े हर व्यक्ति की धारणा बन चुकी है कि उनके अधीन हर निर्माण कार्य, हर सप्लाई ऑर्डर और हर भुगतान के पीछे तीन से पाँच प्रतिशत का एक अदृश्य कर (Invisible Tax) पहले से निर्धारित रहता है। यह कर शासन ने नहीं लगाया, लेकिन ठेकेदारों की ज़ुबान पर इसका हिसाब किसी सरकारी अधिसूचना से कम नहीं।
साहब का सरकारी आवास मानो सरकारी नहीं, बल्कि ठेकेदारों और अधीनस्थों की सामूहिक ज़िम्मेदारी बन चुका है। घर का राशन, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, विशेष आवश्यकताएँ—सब कुछ कथित रूप से सरकारी और गैर-सरकारी मातहतों पर निर्भर है। आखिर क्यों नहीं... साहब का फरमान जो है...
अन्त में साहब के लिए इतना ही कहेंगे... "अति सर्वत्र वर्जयेत्।"
पिता के लिए श्रवण कुमार बने I.A.S अगवा की इनोवा कार... खर्च का बोझ ठेकेदार के कंधो पर
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