नई दिल्ली। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को उनकी खीरे (ककड़ी) की व्यावसायिक खेती परियोजना के लिए करीब 99 लाख रुपये की सरकारी सब्सिडी मिलने का मामला चर्चा में है। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह सब्सिडी उसी मंत्रालय के अधीन संचालित योजना के तहत दी गई, जिसमें वह स्वयं राज्य मंत्री हैं। रिपोर्ट सामने आने के बाद हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, मंत्री की ओर से इस मामले पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है और किसी भी तरह की अनियमितता का आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
किस योजना के तहत मिली सब्सिडी?
रिपोर्ट के अनुसार, यह सब्सिडी राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (National Horticulture Board - NHB) की "डेवलपमेंट ऑफ कमर्शियल हॉर्टिकल्चर" योजना के तहत दी गई। यह योजना एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) के अंतर्गत संचालित होती है और बड़े स्तर पर व्यावसायिक बागवानी को बढ़ावा देने के लिए परियोजना लागत का अधिकतम 50 प्रतिशत या एक करोड़ रुपये तक की सब्सिडी प्रदान करती है।
कितनी राशि मिली?
रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के पीह गांव स्थित भागीरथ चौधरी के फार्म पर लगे बोर्ड में परियोजना की कुल लागत 1.99 करोड़ रुपये दर्ज है। इसमें लगभग 99.60 लाख रुपये की सरकारी सब्सिडी का उल्लेख किया गया है। वहीं परियोजना के लिए करीब 1.49 करोड़ रुपये का बैंक ऋण लिया गया था, जिसमें मार्च 2026 में लगभग 99.03 लाख रुपये की सब्सिडी सीधे जमा किए जाने का दावा किया गया है।
हितों के टकराव का सवाल क्यों उठा?
राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की संरचना के अनुसार केंद्रीय कृषि मंत्री इसके पदेन अध्यक्ष (Ex-officio President) होते हैं, जबकि कृषि राज्य मंत्री पदेन उपाध्यक्ष (Ex-officio Vice-President) होते हैं। इसी वजह से सवाल उठ रहे हैं कि जिस मंत्रालय और उससे जुड़े बोर्ड के अंतर्गत योजना संचालित होती है, उसी मंत्रालय के राज्य मंत्री को सब्सिडी मिलने से हितों के टकराव की स्थिति बनती है या नहीं।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार परियोजनाओं को अंतिम मंजूरी देने वाली समिति में कृषि मंत्री या राज्य मंत्री शामिल नहीं होते। अंतिम स्वीकृति एनएचबी की प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी देती है।
कब मिली मंजूरी?
रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथ चौधरी ने अप्रैल 2025 में योजना के लिए आवेदन किया था और 14 दिनों के भीतर परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई। इसके बाद निरीक्षण और अन्य औपचारिकताएं पूरी होने पर 11 मार्च 2026 को अंतिम स्वीकृति दी गई। 30 मार्च 2026 को सब्सिडी की राशि बैंक खाते में स्थानांतरित कर दी गई।
मंत्री से मांगा गया जवाब
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथ चौधरी से इस मामले में सवाल पूछे गए थे कि क्या यह हितों के टकराव का मामला है। हालांकि, उनके कार्यालय ने प्रश्न मिलने की पुष्टि की, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक मंत्री की ओर से कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया गया था।
पहले भी किया था आवेदन
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि वर्ष 2018 में भी भागीरथ चौधरी ने इसी योजना के तहत आवेदन किया था, लेकिन तकनीकी कारणों से वह आवेदन अस्वीकृत हो गया था। उसी वर्ष उनके पुत्र ने भी एक परियोजना के लिए आवेदन किया था, जिसे योजना की शर्तें पूरी न होने के कारण मंजूरी नहीं मिली थी।
अब आगे क्या?
फिलहाल यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा का विषय बना हुआ है। अब तक किसी जांच एजेंसी ने इस परियोजना में नियमों के उल्लंघन या वित्तीय अनियमितता की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। आने वाले समय में यदि सरकार, संबंधित विभाग या किसी जांच एजेंसी की ओर से कोई आधिकारिक कार्रवाई या स्पष्टीकरण जारी होता है, तो उसी के आधार पर मामले की आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
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