स्वराज एक्सप्रेस इस खबर को गीता के एक श्लोक को थोड़ा भंजित करके शुरू कर रहा है—
“यदा यदा हि भ्रष्टस्य, तदा तदा प्रकाश्यते।”
अर्थात जब-जब अनियमितताएँ अपनी सीमा लाँघती हैं, तब-तब उनके आवरण स्वतः हटने लगते हैं।
राजनीति और नौकरशाही के गलियारों में प्रचलित एक कहावत है—“कौआ चले हंस की चाल, अपनी चाल भी भूल जाए।” किंतु मध्यप्रदेश के एक चर्चित पीए साहब पर यह कहावत शायद लागू नहीं होती। उन्होंने तो सालों से ऐसी चाल चल रखी है कि सत्ता बदली, मंत्री बदले, विभाग बदले, पर उनकी कुर्सी और प्रभाव अक्षुण्ण बना रहा। मतलब, उनकी कहानी इस कहावत को बयां करती है कि लंका रहे या न रहे, मगर मंदोदरी पटरानी रहेगी ही।
स्वराज एक्सप्रेस ने पूर्व में मंत्राणी जी के पीए साहब की कथित संपत्ति, प्रभाव और वसूली तंत्र से जुड़े अनेक सवाल उठाए थे। किंतु जब इन महाशय के दो दशक के कार्यकाल की परतें और गहराई से खंगाली गईं, तब एक से बढ़कर एक कारनामे सामने आने लगे। उनमें से एक कारनामा ऐसा भी है, जो सीधे शिक्षा व्यवस्था यानी छात्रों के भविष्य से जुड़ा है और सरकार की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न अंकित करता है।
तो चलिए चलते हैं पीए साहब के उस कार्यकाल की ओर, जब वे एक पावरफुल मंत्री के ओएसडी रहे थे। तब उन्होंने एक निजी विश्वविद्यालय को मान्यता दिलवाने में कैसे गुल खिलाया था।
शासन के नियमों के मुताबिक किसी भी निजी विश्वविद्यालय की स्थापना कोई साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती। इसके लिए सर्वप्रथम राज्य शासन द्वारा गठित समिति भौतिक अधोसंरचना, भूमि, भवन, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल मैदान, छात्रावास एवं अन्य आवश्यक संसाधनों का परीक्षण करती है। तत्पश्चात निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग द्वारा परीक्षण होता है और अंततः सभी मानकों की पूर्ति होने पर ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अपनी स्वीकृति प्रदान करता है।
परंतु आरोप है कि यह प्रारंभिक परीक्षण प्रक्रिया ही कमीशनखोरी की भेंट चढ़ गई। कहा जाता है कि जिस परिसर को विश्वविद्यालय का स्थायी अधोसंरचनात्मक ढाँचा दर्शाया गया, वह वास्तव में एक विद्यालय था, जहाँ अस्थायी रूप से विश्वविद्यालय के नाम का बोर्ड लगाकर निरीक्षण कराया गया। इसके उपरांत राज्य शासन को यह प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया कि विश्वविद्यालय के पास नियमानुसार पर्याप्त अधोसंरचना उपलब्ध है।
हालाँकि मौजूदा समय में विश्वविद्यालय के पास दर्शाई गई अधोसंरचना मौजूद है, मगर उस समय आनन-फानन में इसलिए निरीक्षण कराया गया कि पावरफुल मंत्री के ओएसडी रहते हुए साहब विश्वविद्यालय स्थापित करने की राज्य शासन से मिलने वाली सारी एनओसी फटाफट दिलवा दें, क्योंकि कुछ दिनों बाद ही विधानसभा के चुनाव होने थे। तो फिर “कौन राजा, कौन जोगी” वाली कहावत चरितार्थ हो जाती।
साथ ही, निरीक्षण समिति के अन्य सदस्य रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज कराने की स्थिति में इसलिए नहीं थे कि अध्ययन से जुड़े पावरफुल मंत्री के ओएसडी होने के साथ-साथ साहब निरीक्षण समिति के भी सर्वेसर्वा थे। फिर भला समिति के अन्य सदस्य प्रशासनिक पदानुक्रम और राजनीतिक प्रभाव के मकड़जाल में क्यों उलझते।
खैर, अब यहाँ यक्ष प्रश्न यह है कि राज्य भाजपा सरकार के पास आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक अनिवार्यता या राजनीतिक विवशता है, जिसके कारण यही पीए साहब पिछले लगभग दो दशकों से बंदरकूदनी की भाँति सत्ता के गलियारों में एक मंत्री से दूसरे मंत्री, दूसरे से तीसरे, फिर चौथे के यहाँ कूदकर स्थापित हो जाते हैं। कभी ओएसडी, कभी निजी सचिव और कभी किसी अन्य प्रभावशाली दायित्व पर उनकी नियुक्ति होती रही। संयोग यह भी है कि अधिकांशतः उन्हें वही दायित्व मिलते रहे हैं, जहाँ निर्णय, अनुमोदन अथवा वित्तीय प्रभाव की पर्याप्त संभावनाएँ मौजूद थीं।
क्या शासन-प्रशासन में योग्य और अनुभवी अधिकारियों का अभाव है, या फिर इन महोदय के पास कोई ऐसा अदृश्य कौशल है, जो उन्हें प्रत्येक सत्ता परिवर्तन के बाद भी प्रभाव के केंद्र में बनाए रखता है?
हाँ, राजनीतिक गलियारों में यह फुसफुसाहट भी चर्चा में आने लगी है कि पीए साहब का जिस मंत्री के साथ राजनीतिक “सौभाग्य” जुड़ जाता है, उसका अगला राजनीतिक अध्याय प्रायः समाप्ति की ओर जाने लगता है। कोई चुनाव हार जाता है, तो कोई चुनाव जीतने के बाद भी मंत्रिमंडल से बाहर हो जाता है, तो किसी का भविष्य ही अप्रत्याशित मोड़ ले लेता है।
ऐसे में स्वराज एक्सप्रेस को मंत्राणी जी के भविष्य की चिंता सता रही है। वैसे भी वे कहीं न कहीं विवादों में आ चुकी हैं। फिर भी स्वराज एक्सप्रेस ईश्वर से मंत्राणी जी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।
चलते-चलते महान चतुरसुजान पीए साहब के लिए एक शेर अर्ज है—
“सच को दबाने वाले अक्सर भूल जाते हैं,
धूप की आदत है, हर दरार से निकल आती है।”
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Bahut khoob.