मध्यप्रदेश की राजिनीति मे यह बात यदा कदा उठती ही रहती है कि प्रदेश मे आदिवासी मतदाताओं के बल पर ही सरकारें बनती रही है दल कोई सा भी हो ...मगर जब भी आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने की बात आई तो उनके साथ हमेशा धोखा ही हुआ है ...चाहे 1980 की बात हो य़ा फिर 1993 की...80 मे शिवभान सिंह सोलंकी के साथ विधायकों का बहुमत था ...उस समय केन्द्र और प्रदेश की राजिनीति के धुरन्धर माने जाने वाले विद्याचरण शुक्ल भी शिवभानु सिंह सोलंकी को मुख्यमंत्री बनाने के लिये लाबिंग कर रहे थे..जाहिर है उनके समर्थक कांग्रेसी विधायक भी शिवभानु सोलंकी के ही पक्ष भे थे फिर भी दिल्ली के फरमान पर अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया गया..दरअसल संजय गांधी के ने अचानक दिल्ली से टेलीफोनिक फरमान जारी कर दिया कि अर्जुन सिंह को बिधायक दल का नेता बनाया जाता है नतीजतन विधायको की चल रही रायसुमारी फुस्स हो गयी...लेकिन चुकी ज्यादा बिधायक सोलंकी के साथ थे इसलिये उन्हे उपमुख्यमंत्री बना दिया गया.. ऐसे ही 1993 मे भी आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने की बात आई और कांग्रेस सरकार बनने मे आदिवासी बिधायकों की संख्या भी भरपूर थी फिर भी हाईकमान के भेजे गये पर्यवेक्षक दल ने फैसला सुना दिया कि रायसुमारी मे दिग्विजय सिंह बाजी मार रहे हैं....मगर हम आपको बता रहे है कि मध्यप्रदेश मे भी आदिवासी मुख्यमंत्री बन चुका है..यह और बात है कि वो मध्यप्रदेश –छत्तीसग़ढ जब एक थे तब की बात है...जी हां सन् 1969 मे सम्मित सरकार गिरी और गोविन्द नरायण सिंह मुख्यमंत्री पद से हटे तो रायगढ जिले के सारंगढ रियासत के अन्तिम शासक प्रदेश के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री बने थे...हालांकि वो मात्र 13 दिन के लिये ही मुख्यमंत्री के कुरसी मे बैठ पाये ....जिनका कार्यकाल 13 मार्च से लेकर 25 मार्च तक रहा...अब आप यह सोच रहे होगे कि सारंगढ रियासत के राजा और नाम राजा नरेश चंद्र सिह गोड आदिवासियो का ही शासन रहा है...तो ऐसा नही है कि प्रदेश ने आदिवासी मुख्यमंत्री नही दिया है...अभी के लिये इतना ही आगे हम बतायेगे कि आखिर इंदिरा गांधी की क्या मजबूरी थी कि उन्हे नरेश चंद को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा और फिर क्या मजबूरी रही कि 13 दिन मे ही हटाना भी पड़ा...
मध्यप्रदेश के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री की अनकही कहानी
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