Monday, 13 July 2026
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जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने संभाली आज़ाद हिंद फौज की कमान, अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ा निर्णायक सैन्य अभियान

 

नई दिल्ली। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 4 जुलाई 1943 का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में आज़ाद हिंद फौज (Indian National Army-INA) की कमान संभाली। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को नई दिशा दी और "दिल्ली चलो" का ऐतिहासिक नारा देकर भारत की आजादी के लिए निर्णायक सैन्य अभियान शुरू किया।

कैसे हुई आज़ाद हिंद फौज की शुरुआत?

आज़ाद हिंद फौज की स्थापना का विचार सबसे पहले कैप्टन मोहन सिंह, रासबिहारी बोस और निरंजन सिंह गिल ने रखा था। जापान के सहयोग से दक्षिण-पूर्व एशिया में रह रहे भारतीय सैनिकों और प्रवासी भारतीयों को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ एक सैन्य बल तैयार किया गया। इसी उद्देश्य से इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का गठन भी किया गया, जिसका मकसद स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करना था।

नेताजी को क्यों सौंपी गई कमान?

1942 में आज़ाद हिंद फौज के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद उभरने लगे। इसी दौरान जर्मनी में रह रहे नेताजी सुभाष चंद्र बोस को दक्षिण-पूर्व एशिया आने का निमंत्रण दिया गया। 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में आयोजित बैठक में सर्वसम्मति से नेताजी को इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और आज़ाद हिंद फौज का सर्वोच्च नेतृत्व सौंप दिया गया।

"दिल्ली चलो" के नारे से भरा जोश

कमान संभालने के अगले ही दिन यानी 5 जुलाई 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में आज़ाद हिंद फौज की भव्य सैन्य परेड को संबोधित किया। इसी दौरान उन्होंने ऐतिहासिक नारा "दिल्ली चलो" दिया और सैनिकों से भारत की आजादी के लिए अंतिम संघर्ष के लिए तैयार रहने का आह्वान किया। यह नारा आज़ाद हिंद फौज की पहचान बन गया।

बनाई गई आज़ाद हिंद सरकार

21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में आज़ाद हिंद सरकार (Provisional Government of Free India) की स्थापना की। इस सरकार में नेताजी ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष की जिम्मेदारी स्वयं संभाली। कई देशों—जर्मनी, जापान, इटली, फिलीपींस, चीन, आयरलैंड और अन्य मित्र देशों—ने इस सरकार को मान्यता भी दी।

अंडमान-निकोबार पर फहराया तिरंगा

जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीपों का प्रशासन आज़ाद हिंद सरकार को सौंप दिया। 30 दिसंबर 1943 को नेताजी ने वहां तिरंगा फहराया और अंडमान का नाम "शहीद द्वीप" तथा निकोबार का नाम "स्वराज द्वीप" रखा। यह पहली बार था जब भारत की स्वतंत्र सरकार ने भारतीय भूमि पर अपना राष्ट्रीय ध्वज फहराया।

भारत की धरती तक पहुंची आज़ाद हिंद फौज

1944 में आज़ाद हिंद फौज और जापानी सेना ने बर्मा (अब म्यांमार) के रास्ते भारत की सीमा में प्रवेश किया। कोहिमा और इम्फाल क्षेत्रों में ब्रिटिश सेना के खिलाफ भीषण लड़ाई लड़ी गई। हालांकि शुरुआती सफलता के बाद द्वितीय विश्व युद्ध का रुख बदलने से यह अभियान आगे नहीं बढ़ सका।

गांधी जी से मांगा था आशीर्वाद

6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से प्रसारित अपने संदेश में नेताजी ने पहली बार महात्मा गांधी को "राष्ट्रपिता" कहकर संबोधित किया। उन्होंने स्वतंत्रता के अंतिम युद्ध के लिए गांधी जी का आशीर्वाद और देशवासियों का सहयोग मांगा।

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा"

22 सितंबर 1944 को शहीदी दिवस के अवसर पर नेताजी ने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा—"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।" यह नारा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रेरणादायक नारों में से एक बन गया।

युद्ध के बाद क्या हुआ?

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान और जर्मनी की हार के बाद आज़ाद हिंद फौज का अभियान कमजोर पड़ गया। 18 अगस्त 1945 को नेताजी की विमान दुर्घटना में मृत्यु होने की खबर सामने आई। इसके बाद आज़ाद हिंद फौज के कई अधिकारियों और सैनिकों को गिरफ्तार कर दिल्ली के लाल किले में उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।

लाल किला मुकदमा बना जनआंदोलन

कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और मेजर शाहनवाज खान पर चलाए गए मुकदमे ने पूरे देश में जबरदस्त जनआक्रोश पैदा कर दिया। "लाल किले को तोड़ दो, आज़ाद हिंद फौज को छोड़ दो" जैसे नारे पूरे देश में गूंजने लगे। इतिहासकारों का मानना है कि इस जनदबाव ने भी ब्रिटिश सरकार पर भारत छोड़ने का दबाव बढ़ाया।

इतिहास में क्यों अहम है 4 जुलाई 1943?

4 जुलाई 1943 केवल नेतृत्व परिवर्तन की तारीख नहीं थी, बल्कि यह वह दिन था जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम ने राजनीतिक आंदोलन के साथ-साथ संगठित सैन्य संघर्ष का नया अध्याय शुरू किया। नेताजी के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज ने भारतीयों में आत्मविश्वास जगाया और यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता केवल मांगने से नहीं, बल्कि संघर्ष से भी हासिल की जा सकती है।

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