News desk bhopal : आज हम आपको स्वराज एक्सप्रेस के इस खास कार्यक्रम कही-अनकही में एक ऐसा वाकया बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर आप स्तब्ध रह जाएंगे। बिल्कुल सच घटना है। क्या आप यह मानने को तैयार हो जाएंगे कि मध्यप्रदेश का एक ताकतवर नेता, जो प्रदेश का दो बार मुख्यमंत्री रहा हो, उसे मरने के बाद एक कफन तक नसीब न हुआ हो।
जी हां, यही नहीं उस मुख्यमंत्री के तीन बेटों में से एक बेटा आईएएस अधिकारी रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मुख्य सचिव तो रहे ही, साथ ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रहे। इन अधिकारी का नाम था ब्रिजेश मिश्रा और उनके पिता थे पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र, जो डी.पी. मिश्रा के नाम से ज्यादा जाने जाते थे।
ये वही डी.पी. मिश्रा थे जो स्वतंत्रता से पहले ही कांग्रेस से जुड़े थे। बाद में 1962 में कैलाश नाथ काटजू के हटने के बाद 30 सितंबर 1963 को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए। एक नहीं, बल्कि दो बार डी.पी. मिश्रा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
कहा जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह भी उनके अनुचरों में रहे। इतना ही नहीं, इंदिरा गांधी को पहली बार प्रधानमंत्री बनवाने में भी उनका खास योगदान माना जाता है। जब लाल बहादुर शास्त्री जी का निधन हुआ तो उनकी जगह प्रधानमंत्री बनने के लिए कई कांग्रेसी दिग्गज मैदान में थे, मगर डी.पी. मिश्रा की रणनीति ही इंदिरा गांधी के काम आई। उन्होंने देश के सभी प्रदेशों के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को इंदिरा गांधी के पक्ष में खड़ा कर दिया और अंततः वह प्रधानमंत्री बन गईं।
अब बात करते हैं डी.पी. मिश्रा के आखिरी दिनों की।
जिन मिश्रा जी ने अपने राजनीतिक जीवन को बड़ी शान से जिया, वे हमेशा लकदक कलफ लगे कपड़े पहनते थे। यदि किसी रेस्ट हाउस या होटल में उस समय एयर कंडीशनर उपलब्ध नहीं होता था तो डी.पी. मिश्रा वहां रुकते ही नहीं थे। मौजूदा सरकारों में पचमढ़ी में कैबिनेट बैठक करने की जो परंपरा चली आ रही है, उसकी शुरुआत भी डी.पी. मिश्रा ने ही की थी। यही कारण था कि उन्हें पचमढ़ी बेहद पसंद थी और उनकी अंतिम इच्छा भी यही थी कि उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार पचमढ़ी में किया जाए।
मगर उनकी अंतिम इच्छा पूरी होना तो दूर, उनके शरीर को कफन तक नसीब नहीं हुआ।
अंतिम समय में जब वह बीमार हुए तो दिल्ली के अस्पताल में भर्ती कराए गए। उस समय उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। तब मध्यप्रदेश सरकार ने उनके इलाज के लिए 15 हजार रुपये स्वीकृत किए और भिजवाए। लेकिन वर्ष 1988 में भी उनके राजनीतिक विरोधी प्रदेश मंत्रालय की गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे। इसलिए यह खबर अखबारों में प्रकाशित करवा दी गई कि सरकार डी.पी. मिश्रा के इलाज के लिए 15 हजार रुपये दे रही है।
जब यह बात मिश्र जी को पता चली तो उन्होंने सरकारी सहायता लेने से साफ मना कर दिया और कहा कि अस्पताल का खर्च उनकी पेंशन से अदा किया जाए।
आखिरकार 5 मई 1988 को उनका निधन हो गया।
चूंकि उनका निवास जबलपुर में था, इसलिए उनके पार्थिव शरीर को जबलपुर लाया गया। पूरे शहर में अंतिम यात्रा निकाली गई। इतनी बड़ी राजनीतिक हस्ती के निधन पर उम्मीद थी कि शहर में भारी भीड़ उमड़ेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बमुश्किल सैकड़ा भर लोग शव यात्रा में शामिल हुए। न शहर की दुकानें बंद हुईं, न कोई विशेष राजकीय सम्मान मिला।
इतना ही नहीं, उनके पार्थिव शरीर पर कफन तक नहीं था, जबकि उनके तीनों बेटे अंतिम संस्कार में मौजूद थे। प्रदेश में उस समय अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे, लेकिन जिला प्रशासन की ओर से भी कोई व्यवस्था नहीं की गई।
आखिरकार शहर के ही एक निजी अस्पताल विक्टोरिया से एक धुली हुई चादर का इंतजाम किया गया। उसी चादर से उनके पार्थिव शरीर को ढका गया और उसे ही कफन बनाया गया। इसके बाद उनकी चिता को अग्नि दी गई।
इसी को कहते हैं समय का फेर।
महाभारत में भी कहा गया है कि "आदमी नहीं, समय बलवान होता है।" इसी संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है—
"भीलन लूटी गोपिया, वही अर्जुन, वही बाण।"
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