चाहे देश की हो या प्रदेश की, या फिर नुक्कड़ में बैठे लोगों के बीच अगर राजनीति की चर्चा होगी तो रंगा-बिल्ला का नाम किसी न किसी की जुबान से जरूर चर्चा में आता है। लोग यही कहते हैं कि मौजूदा समय में दो ही नेता हैं—रंगा और बिल्ला। ये दोनों नेता कौन हैं, ये बात अलग है... लेकिन रंगा-बिल्ला कौन थे, ये बताता हूं।
दरअसल, रंगा-बिल्ला दो जघन्य अपराधी थे, जिनको फांसी पर लटकाया गया था। रंगा का असली नाम कुलजीत सिंह तो बिल्ला का जसवीर सिंह था। इन दोनों ने सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी की बेटी गीता चौपड़ा, जिसकी उम्र 16 साल थी, और बेटे संजय चौपड़ा, जिसकी उम्र 14 साल थी, का अपहरण करके हत्या कर दी थी। हत्या के पहले गीता के साथ दोनों ने बलात्कार भी किया था। इस केस ने समूची दिल्ली को दहला दिया था।
16 अगस्त 1978 को दिल्ली के धौलाकुआं क्षेत्र से रंगा-बिल्ला ने दोनों बच्चों का अपहरण किया था। उस समय दोनों आकाशवाणी के एक कार्यक्रम युववाणी में भाग लेने संसद मार्ग जा रहे थे। रंगा-बिल्ला ने दोनों बच्चों का अपहरण तो फिरौती के लिए किया था, मगर जब उन्हें पता चला कि वो सेना के अफसर के बच्चे हैं तो प्लान बदल दिया और गीता के साथ बलात्कार करने के बाद धारदार हथियार से हत्या कर दिल्ली के पास ही रिज के जंगल में फेंक दिया।
जिसे 28 अगस्त को एक चरवाहे ने जंगल में बच्चों की लाश सड़ी हालत में पड़ी होने की पुलिस को सूचना दी। रंगा-बिल्ला इस कृत्य को करने के बाद आगरा भाग गये। मगर जब वो 15 दिन बाद आगरा से दिल्ली लौट रहे थे तो पकड़े गये।
उनके पकड़े जाने का वाकया भी दिलचस्प है। हुआ ये कि वो आगरा से दिल्ली जा रही कालका एक्सप्रेस में सेना के लिए आरक्षित डिब्बे में गलती से चढ़ गये। जैसे ही डिब्बे में उन्होंने सेना के जवानों को देखा तो घबराकर भागने की कोशिश की। लेकिन चूंकि सेना के अफसर के बच्चों की बात थी तो पुलिस द्वारा जारी किये गये स्केच को ज्यादातर जवानों ने देखा था।
ऐसे में डिब्बे में बैठे लांस नायक गुरतेज सिंह और ए.वी. शेट्टी की नजर उन पर पड़ी तो उनकी शक्ल अखबार में छपी फोटो से मिलती-जुलती थी। जिससे सेना के जवानों ने उन्हें दबोच लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। उनके पास से खून से सने कपड़े और एक तलवार के साथ जिंदा कारतूस भी बरामद हुआ।
केस इतना गंभीर और हाईलाइटेड था कि कोर्ट की कार्यवाही भी फटाफट हुई और सेशन कोर्ट ने 6 माह में ही फांसी की सजा सुना दी। हालांकि दोनों हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी फांसी की सजा रुकवाने की गुहार लगाई, मगर कहीं से राहत नहीं मिली और अन्ततः दोनों को दिल्ली के तिहाड़ जेल में 31 जनवरी 1982 को फांसी पर लटका दिया गया।
आपको यह भी बता दें कि भारत सरकार के भारतीय कल्याण परिषद द्वारा जो 16 साल से कम उम्र के बच्चों को वीरता पुरस्कार दिया जाता है, वो इन्हीं गीता चौपड़ा और संजय चौपड़ा की स्मृति में दिया जाता है।
खैर, रंगा-बिल्ला अपराध की तो यह कहानी अलग है, लेकिन पूरे देश में यह केस हर आदमी की जुबान पर था। इसीलिए जब किसी दो लोगों की जोड़ी देखी जाती तो लोग हिटलरशाही के तौर पर व्यंग्य के रूप में रंगा-बिल्ला की जोड़ी का ताना देने लगे।
अब इस समय ये रंगा-बिल्ला की जोड़ी का ताना किसके बारे में दिया जा रहा है, इसका अंदाजा खुद लगा लीजिए या किसी अपने मित्र से पूछ लीजिए जो राजनीतिक मुद्दों पर रुचि रखता हो।
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