Monday, 13 July 2026
Swaraj Express
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मध्य प्रदेश

कमिश्नर की मेहरबानी से लोकायुक्त के शिकंजे से निकलकर 'कमीशन साम्राज्य' के शिखर पर पहुँचे सहायक यंत्री!

कलम जब मेहरबान होती है... तब तकदीर भी गुलज़ार होती है..
जो ख़ता अदालत तक पहुँचनी थी... वो फाइल में ही बेकरार हो गई...
स्वराज एक्सप्रेस की यह पड़ताल इन पंक्तियों से इसलिए शुरू हो रही है कि यह आभास कराती हैं कि यदि सत्ता के गलियारों में किसी प्रभावशाली कलम का वरदहस्त प्राप्त हो जाए, तो अभियोजन की तलवार भी म्यान में लौट सकती है। और फिर जब बात वरिष्ठ आई.ए.एस. अफसर की हो, तो उनकी कलम लौह कवच का काम करती है, भले ही मामला कितना भी पेचीदा हो। कुछ ऐसा ही हुआ है शहर से जुड़े एक विभाग में, जहाँ कमिश्नर साहब की कलम ने ऐसा कमाल दिखाया कि लोकायुक्त के जाल में फँस चुके एक सहायक यंत्री की कमीशन की दुकान पहले से भी तेज चल निकली। साथ ही विभागीय गलियारों में उनकी ठसक और भी प्रभावशाली हो गई। नतीजतन उनके कार्यालय में पदस्थ वरिष्ठ अधिकारी भी सहायक यंत्री से भय खाने लगे। खाएँ भी क्यों नहीं, जब विभाग के कमिश्नर का ही पीठ पर हाथ हो तो उसे आँधियों से भय कैसा।
तो किस्सा कोताही का यह है, ये सहायक यंत्री साहब चार साल पहले जब सागर जिले में पदस्थ थे, तब इन्होंने एक ठेकेदार से बिल भुगतान के बदले में कमीशन माँगा। जिस पर ठेकेदार से कथित रिश्वत लेने के आरोप में लोकायुक्त पुलिस ने सहायक यंत्री एवं उनके अधीनस्थ उपयंत्री को मय सबूत दबोच लिया तथा दोनों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अभियोजन स्वीकृति हेतु प्रस्ताव विभागीय कमिश्नर के समक्ष प्रस्तुत किया गया। बस यहीं से प्रारंभ होती है वह कथा, जिसे विभागीय अधिकारी भी दबे स्वर में "फाइल का चमत्कार" कहकर संबोधित करते हैं।
कमिश्नर साहब ने उपयंत्री के विरुद्ध अभियोजन संस्थित करने की स्वीकृति तो दे दी, पर सहायक यंत्री महोदय को छोड़ दिया। जबकि कमिश्नर साहब के ही द्वारा पारित आदेश के प्रारंभिक अनुच्छेदों में दोनों अधिकारियों के विरुद्ध प्रथमदृष्टया अपराध सिद्ध होने का उल्लेख किया गया। अर्थात दस्तावेज़ स्वयं यह स्वीकार करता है कि दोनों के विरुद्ध अभियोजन चलाने योग्य परिस्थितियाँ विद्यमान हैं। किंतु जैसे-जैसे आदेश अंतिम अनुच्छेद तक पहुँचता है, कथानक अप्रत्याशित मोड़ ले लेता है और अंतिम आदेश में अभियोजन की स्वीकृति केवल उपयंत्री के विरुद्ध प्रदान की जाती है, जबकि सहायक यंत्री का नाम मानो फाइल के पन्नों से विलीन हो जाता है।
अब प्रश्न यह है कि यदि प्रारंभिक निष्कर्ष समान थे, तो अंतिम निर्णय असमान क्यों हुआ? यही वह प्रश्न है, जो विभागीय गलियारों में फुसफुसाहट बनकर गूँज रहा है।
"अजब दस्तूर है साहब, यहाँ इंसाफ बिकता है,
कोई इल्ज़ाम में डूबे, कोई एहसान में दिखता है।"
मजे की बात यह है कि लोकायुक्त की कार्रवाई के उपरांत प्रशासनिक नियमों के अनुरूप दोनों अधिकारियों का तुरंत दूसरे जिलों में स्थानांतरण भी किया गया। अर्थात प्रारंभिक स्तर पर दोनों को समान रूप से दोषी माना गया। किंतु समय का पहिया घूमता गया और कथित रूप से कमिश्नर की कृपा का प्रभाव भी दिखाई देने लगा। लेकिन सहायक यंत्री पर कमिश्नर साहब ने कृपा दिखाकर खुद को कमीशन के कटघरे में खड़ा कर लिया है, क्योंकि इंजीनियर साहब ने कमीशन की दुकान का पूरा शटर खोल दिया है और यही संदेश दे रहे हैं कि "व्यवस्था बदल गई है, इसलिए व्यवस्था शुल्क भी बदल गया है।" अर्थात कमीशन की राशि ऊपर तक पहुँचाए जाने का तर्क दिया जा रहा है। स्वाभाविक है, बात दूर तलक जा रही है।
खैर, यदि यह दावा सत्य है, तो यह केवल आर्थिक अनियमितता का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रशासनिक नैतिकता के क्षरण का भी गंभीर संकेत है। बहरहाल मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में एक वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी की कलम न्यायिक प्रक्रिया की दिशा भी परिवर्तित कर सकती है। यह तो रहा एक नमूना। इसी प्रसंग में एक दूसरा उदाहरण भी है, जो पुराना है लेकिन दमदार है। जब मालवा क्षेत्र में पदस्थ एक मोहतरमा को लोकायुक्त ने रंगे हाथों पकड़ा था और फिर लोकायुक्त पुलिस के द्वारा विभाग से अभियोजन की स्वीकृति माँगी गई, तो मोहतरमा विभाग के प्रमुख सचिव के सामने शरणागत हो गईं। प्रमुख सचिव ने भी वादा निभाते हुए अभियोजन स्वीकृति की फाइल को डंप कर दिया और अधीनस्थों को तर्क यह दिया कि महिला के हाथ में मेहंदी लगी थी, इसलिए सोडियम कार्बोनेट के घोल का रंग गुलाबी हुआ था, जिसके चलते अभियोजन स्वीकृति की फाइल अभी तक अटकी है।
ये मोहतरमा कौन हैं, तो इतना बता देते हैं, ये मालवा के एक जिले में पदस्थ हैं और जल से जुड़े विभाग में सहायक यंत्री हैं। साहब के बारे में आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं...
और अंत में केवल इतना—
"चेहरों पर मुस्कान बहुत है, दिल में कितने राज़ हैं,
काग़ज़ पर सब साफ़ लिखा है, फिर भी कितने परदे आज हैं।"

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